बैचेन करतीं रजनी तिलक की कविताएं- ‘औरत होने की वजह से बहुत कुछ झेलना पड़ता है’

रजनी तिलक ने हमेशा महिलाओं और दलित समाज पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है. महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहारों पर वे लिखती हैं – “आज जब अखबार देते हैं खबरें, हमारी  अस्मिता लुट जाने की, बर्बरता और घिनौनी चश्मदीद, घटनाओं की, खून खौल क्यूं नहीं उठता हमारा?”

रजनी तिलक लिखती हैं-
औरत
एक जिस्म होती है
रात की नीरवता
बन्द ख़ामोश कमरे में
उपभोग की वस्तु होती है।

रजनी तिलक ने इस पितृसत्तात्मक समाज की महिलाओं के बारे में सोच को लेकर काफी कुछ लिखा और कहा है. रजनी तिलक एक प्रभावशाली लेखक-कवि होने के साथ-साथ दलित नारीवादी आंदोलन की एक सशक्त आवाज थीं. रजनी तिलक में आंदोलन और लेखन के माध्यम से दलित महिला के साथ होने वाले भेदभाव, अत्याचार को उठाया है. रजनी तिलक की आत्मकथा ‘अपनी जमीं, अपना आसमां’, कहानी संग्रह ‘बेस्ट ऑफ करवाचौथ’ कविता संग्रह ‘पदचाप’ और ‘हवा सी बेचैन युवतियां’ काफी चर्चित हुए हैं. रजनी तिलक भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कविताओं को पढ़कर लगता है कि उन्होंने मणिपुर, बंगाल या अन्य जगह महिलाओं के साथ हो रही घटनाओं के बारे में काफी पहले ही लिख दिया था. प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएं-

वजूद है

आज जब अखबार देते हैं खबरें
हमारी  अस्मिता लुट जाने की
बर्बरता और घिनौनी चश्मदीद
घटनाओं की
खून खौल क्यूं नहीं उठता हमारा?
सफेदपोशी में ढंकते-ढांपते
हम मुर्दा ही हो चले हैं

खाक होना है एक दिन सबको
फिर आज ही लड़कर
खाक क्यों नहीं होते?
जानते हो न?
एक जमाने में अखबारों में
हमारी परछाइयां भी वर्जित थीं
अभिव्यक्ति पर पाबंदी थी
अशिक्षा-अंधकार नियति थी
तब मुर्दों से अछूतों में
स्वाभिमान की चिंगारी
फूटती थी

चिथड़ों से लिपटे कंकालों ने
तुम्हारे-हमारे लिए दो गज जमीन
स्वाभिमान और आजादी
की जंग जीती थी
चिथड़ों से लिपटे इनसान आज भी हैं
उनकी भूख और बूढ़ी आंखें देख
मुंह फेर कर चल सकते हो
परंतु यह हमारा अतीत है
हमारी सफेदपोशी
उनके संघर्षों का वजूद है।

नाचीज

औरत होने की वजह से
बहुत कुछ झेलना पड़ता है
रात को दिन, दिन को रात
सूरज का चांद कहना पड़ता है
और जो खुद को इनसान समझे
तो दुनिया खिलाफ हो जाती है
समाज तूफान ले आता है
परिवार सहम जाता है

औरत तूफान पर चलती है
घृणा की ओढ़नी ओढ़ती है
क्या फर्क पड़ता है
कोख में जीवन रखती है
औरत जो नाचीज होती है।

औरत है क्या औरत?

हर स्त्री मर्द के लिए
एक योनि
एक जोड़ी स्तन
लरजते होंठ है!

बहनापे वाली बहनों ने
मर्दों को धिक्कारा
उन्हें चेताया और कहा
योनी! स्तन! होंठ…
सब हमारे व्यक्तिगत हैं!
हमारा शरीर हमारा है
हमारी भावनाएं
हमारी आजादी, इच्छाएं
पतंग-सी उड़ती महत्त्वाकांक्षाएं
सब हमारी
हम सपनों के महल की तारिकाएं हैं!

कल तक हमने भी बहनापे के राग अलापे
हां, ‘जागो री’ ‘सहेली’ ‘निरंतर’
फोरम की सहेलियों के साथ
हमारे जज्बात
सब सांझे थे
परंतु आज शरीर और मन से आजाद
तुम
तुम्हारा सुंदर संसार
हम कहां हैं इस दुनिया में?

भारत के नक्शे पर भिनभिनाती
मक्खियों-सी
हुनर नहीं, शिक्षा नहीं
रोजगार नहीं
रहने को आवास नहीं
रात को अंधेरे में
डूबी हुई आंखें हैं
निराशा में डूबे मां-बाप
सुबह सवेरे दूधमुंहों को
भेजते हैं सड़कों पर
बटोरती है
लोहा, रद्दी, कूड़ा,
बुहारती
सड़क, गली, चौबारा!

तुमने हमसे कहा
क्या हुआ अगर
तुम्हारे पास दक्षता नहीं
शिक्षा नहीं, पैसे की विरासत नहीं
अस्तित्व नहीं, अभिजात नहीं
वर्णसंकर देवदासी हो
कोल्हाटी की बार गर्ल
या नौटंकी की बेड़नी
एक योनि तुम्हारी भी है
तुम इसे जमीं बना लो
‘सेक्स वर्क’ का बीज जमा दो
पीढ़ी दर पीढ़ी तर जाओगी

हम बहनें तुम्हारी
तुम्हारे लिए लड़ जाएंगी
पुलिस, कानून, पार्लियामेंट
से भिड़ जाएंगी
‘सेक्स वर्क’ को इज्जत दिलाएंगी हम
संसद पहुंच कानून बनाएंगी
पूछती हूं तुमसे मैं
एक योनि सवर्ण बहिना की
उन्हें अपनी योनि पर
खुद का नियंत्रण चाहिए
तब दलित स्त्री की आबरू पर
बाजारू नियंत्रण क्यों?
धन्य हो…आपके बहनापे का
आप जैसी जिनकी मुक्तिदात्री हों
उनकी मुक्ति क्यों?
गुलामी क्यो?

वेश्या

चले आइए
धीरे से दरवाजा उढकाकर
मैं दुख बांटती हूं
जी हां,
मैं दुख बांटती हूं
तुम्हारी मुस्कराहट के लिए
अपनी खुशी बेचती हूं

तन्हाई!
मेरी क्या तन्हाई
मैं तो सिर्फ तुम्हारे लिए
तुम्हारी तन्हाई के लिए जीती हूं

चले आइए, बेझिझक
देहरी लांघकर
इस जालिम पेट के लिए
अपना रूप, अपना स्वाभिमान
अपनी अस्मत बेचती हूं।

दलित महिलाओं की आवाज उठाने के लिए रजनी तिलक ने दिल्ली में भारतीय दलित पैंथर्स के नाम से एक संगठन स्थापित किया. उन्होंने ‘आह्वान थियेटर’ और ‘युवा अध्ययन मंडल’ नामक समूहों की स्थापना करके लोगों के बीच जागरूकता को बढ़ाने का भी काम किया.

रजनी तिलक ने आंगनबाड़ी श्रमिकों के साथ मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर एक संघ का गठन किया. वे ‘नेशनल फेडरशन फॉर दलित वीमेन’, नेकडोर और ‘वर्ल्ड डिगनिटी फोरम’ जैसे संगठनों से भी जुड़ीं रहीं. रजनी तिलक ने समकालीन दलित महिला लेखन और सावित्रीबाई फुले की रचनाओं का अनुवाद भी किया था. 30 मार्च, 2018 को रजनी तिलक ने इस संसार को अलविदा कह दिया.

पुस्तकः प्रतिरोध का स्त्री विरोध (समकालीन हिंदी कविता)
संपादकः सविता सिंह
प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन
कीमत: रु

टैग: हिंदी साहित्य, कविता नहीं, हिंदी लेखक, साहित्य

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