निचली अदालत क्यों नहीं सुना सकती उम्रकैद की सजा? कर्नाटक हाईकोर्ट ने बताए सुप्रीम कोर्ट के मानदंड

हाइलाइट्स

हत्या के मामले में सत्र अदालत ने अप्रैल 2017 में ​सुनाई थी मृत्युपर्यंत कैद की सजा
क्या है मृत्युपर्यंत कैद और आजीवन कारावास में अंतर?

बेंगलुरु. कर्नाटक हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में दोषी व्यक्ति की मृत्युपर्यंत कैद की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया. इससे अब 14 साल जेल में रहने के बाद उसकी रिहाई हो सकेगी. दोषी की अपील पर हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा कि इस तरह की विशेष श्रेणी की सजा केवल हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ही सुना सकता है, न कि निचली अदालत. हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भारत संघ बनाम वी श्रीहरण उर्फ मुरुगन व अन्य मामले में अपने फैसले में भी ऐसी टिप्पणी की थी.

हरीश और लेाकेश नाम के दो व्यक्तियों ने हाईकोर्ट में दो अपील दायर की थीं. वे डी आर कुमार नामक एक व्यक्ति की हत्या के मामले में क्रमश: प्रथम और तीसरे आरोपी हैं. हरीश का कुमार की पत्नी राधा से प्रेम संबंध था, और यह कुमार की हत्या की वजह बना. जब कुमार 16 फरवरी 2012 को हासन जिला स्थित चोल्लेमारदा गांव में एक खेत में काम कर रहा था, तभी हरीश ने एक सरिया से उसके सिर पर प्रहार किया और उसकी हत्या कर दी.

अप्रैल 2017 को जिला अदालत ने किया था दोषी करार
बाद में हरीश ने अपने भाई लोकेश की मदद से उसके शव को ठिकाने लगा दिया. हरीश, राधा और लोकेश पर मुकदमा चला और हासन की एक सत्र अदालत ने 25 अप्रैल 2017 को उन्हें दोषी करार दिया. हरीश को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) के तहत मृत्युपर्यंत कैद की सजा सुनाई गई. उसे आईपीसी की धारा 120 (बी) और 201 के तहत भी सजा सुनाई गई. साथ ही, उसे कुमार के दो बच्चों को तीन लाख रुपये अदा करने का आदेश भी दिया गया.

निचली अदालत की सजा को नहीं माना सही
हाईकोर्ट के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति के. सोमशेखर और न्यायमूर्ति राजेश राय के. की पीठ ने हरीश की दोषसिद्धि को कायम रखा, लेकिन कहा कि निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा सही नहीं है. उन्होंने कहा, ‘‘हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारत संघ बनाम वी श्रीहरण उर्फ मुरुगन व अन्य के मामले में दी गई व्यवस्था के आलोक में यह सजा कानून पर खरा नहीं उतरती है.’’

सुप्रीम कोर्ट के मानदंड की दी गई दलील
हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के मामलों में तीन मानदंड तय किये थे, जिनमें अपराध की पड़ताल, आपराधिक पड़ताल और दुर्लभतम मामला होने की पड़ताल शामिल हैं. हरीश की जमानत और मुचलका रद्द कर दिया गया तथा उसे अपनी सजा काटने के लिए निचली अदालत के समक्ष दो हफ्तों में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया.

टैग: बेंगलुरु समाचार, मौत की सज़ा, कर्नाटक उच्च न्यायालय, सुप्रीम कोर्ट

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