जर्मनी में बज रहा आयुर्वेद का डंका, देसी पद्धति से पार्किंसन का इलाज, 60 बेड के अस्पताल में कई बीमारियों का निदान

हाइलाइट्स

इस अस्पताल में प्रोफेसर होर्स्ट ने 2009 में आयुर्वेद को समर्पित करने का फैसला किया था.
इसमें 60 विस्तर वाला अलग से आयुर्वेद अस्पताल खोला गया.

जर्मनी में पार्किंसंस रोग के लिए आयुर्वेद उपचार: आयुर्वेद भारत का दिया हुआ दुनिया का अनमोल उपहार है. आयुर्वेद का डंका अब दुनिया में भी बजने लगा है. जर्मनी में वाकायदा आयुर्वेद अस्पताल है जिसमें पार्किंसन की बीमारी का इलाज किया जाता है. इसी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को पहले पश्चिमी देश गांव-देहात का इलाज मानते थे, लेकिन जब आयुर्वेद पद्धति से दी जाने वाली देसी दवाओं को लेकर रिसर्च शुरू हुई तब से इसे अब दुनिया वैज्ञानिक मान्यताओं से नवाजने लगे हैं. पार्किंसन की बीमारी में शरीर कंपकंपाता है. यानी शरीर हिलता रहता है और इस स्थिति में शरीर पर खुद का कंट्रोल नहीं रहता. हथेलियों के हिलने से कोई काम करने में बहुत मुश्किल होती है.

मरीज को अंग्रेजी दवा की जरूरत नहीं
इंडियन एक्सप्रेस की खबर में जर्मनी में एक आयुर्वेद अस्पताल है जिसमें पार्किंसन की बीमारी का इलाज किया जाता है. 67 साल की एक पार्किंसन के मरीज का इलाज न सिर्फ अस्पताल में किया जा रहा है बल्कि घर पर भी उसे यह सुविधा दी जा रही है. पिछले पांच साल से वे इलाज करा रही हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि उसे अंग्रीज दवा डोपामाइन की जरूरत नहीं होती. न्यूरोट्रांसमीटर से संबंधित किसी तरह की बीमारी में डोपामाइन टैबलेट की जरूरत होती है लेकिन यहां इलाज करा रहे पार्किंसन के मरीजों को इसकी जरूरत नहीं होती. यहां तक कि मरीज तेज दौड़ सकती है और अपनी हथेलियों पर बेहतर नियंत्रण रख सकती है.

हजारों मरीजों का इलाज
जर्मनी के हैटिंगटन शहर में इवानजेलिकल अस्पताल खोलने वाले प्रोफेसर डॉ. होर्स्ट ने इस अस्पताल को आयुर्वेद के लिए समर्पित कर दिया है. इस अस्पताल में प्रोफेसर होर्स्ट ने 2009 में आयुर्वेद को समर्पित करने का फैसला किया था. इसमें 60 विस्तर वाला अलग से आयुर्वेद अस्पताल खोला गया. उन्होंने पार्किंसन की बीमारी का सीधा संबंध पेट की हेल्थ से जोड़ा था. प्रोफेसर होर्स्ट भारत में कई जगहों का दौरा कर चुके हैं. यहां उन्होंने आयुर्वेद के कई चिकित्सकों से संपर्क किया और इस पद्धति की कई बारीकियों के बारे में विस्तार से जाना. इस अस्पताल के न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट में रिसर्च एसोसिएट डॉ. संदीप नायर बताते हैं, “अब आधुनिक चिकित्सा में भी पेट में मौजूद सूक्ष्म जीवों के महत्व को समझा गया है जबकि आयुर्वेद में बहुत पहले से इसे बात दिया गया था”. सबसे बड़ी बात यह है कि इस अस्पताल से अब तक 7650 पार्किंसन के मरीजों को ठीक किया गया है.

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