The King Who Saved India ‘Suheldev’ : बेहद मनोरंजक और बांधे रखती है बेस्टसेलिंग लेखक अमीश त्रिपाठी की किताब ‘सुहेलदेव’

1974 में जन्मे अमीश त्रिपाठी ने आईआईएम (IIM) कोलकाता से पढ़ाई करने के बाद बैंकर से एक सफल लेखक बनने तक का लंबा सफर तय किया है. शिव पर लिखे गए अपने पहले उन्यास ‘मेलूहा के मृत्युंजय’ से ही अमीश चर्चा में आ गए थे. इस किताब की सफलता के बाद ही उन्होंने फाइनेंशियल सर्विसेज में अपना चौदह साल का करियर छोड़ दिया और लेखन की दुनिया में पूरी तरह से आ गए. इतिहास, पौराणिक कथाओं और दर्शन के प्रति उनके रुझान ने उन्हें विश्व के सभी धर्मों और उसके सौंदर्य को समझने की उन्हें प्रेरणा दी. गौरतलब है, कि उनकी किताबों की पचपन लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं, जिनका उन्नीस से अधिक भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है.

‘सुहेलदेव’ के अलावा अमीश की अन्य पुस्तकों ने भी काफी लोकप्रियता हासिल की है, जिसमें ‘मेलूहा के मत्युंजय’, ‘नागाओं का रहस्य’ और ‘वायुपुत्रों की शपथ’ को भारतीय प्रकाशन क्षेत्र के इतिहास में सबसे तेज़ी से बिकने वाली पुस्तक शृंखला की श्रेणी में रखा जाता है, वहीं ‘राम- इक्ष्वाकु के वंशज’, ‘सीता-मिथिला की योद्धा’ और ‘रावण- आर्यवर्त का शत्रु’ को भी तेज़ी से बिकने वाली पुस्तकों में दूसरे स्थान पर रखा जाता है. इसके साथ ही अमीश की ‘अमर भारत : युवा देश, कालातीत सभ्यता’ भी ख़ासा चर्चित किताब रही है.

अमीश के विषय में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं, “अमीश के लेखन ने भारत के समृद्ध अतीत और संस्कृति के प्रति अथाह जिज्ञासा उत्पन्न की है.” पुरस्कार विजेता फिल्म डायरेक्टर शेखर कपूर ने तो अमीश को ‘साहित्यिक रॉकस्टार’ तक कह दिया है. यह सच है कि आज के समय के अन्य लेखकों के मुकाबले अपनी रचनाओं के माध्यम से अमीश नए भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनकी किताबें इतनी दिलचस्प और जानकारियों से भरपूर होती हैं कि पाठकों को बांध लेती हैं. उनके पास बारीकियों के लिए पैनी नज़र और कथात्मक शैली है, जो अतीत की कहानियों को असाधरण, मौलिक और आकर्षक रूप प्रदान करती हैं. अमीश की सभी किताबों में एक उदारवादी प्रगतिशील विचारधारा प्रवाहित होती है, जो लिंग, जाति या किसी भी तरह के भेदभाव को अपनी कृतियों से अलग रखती है. काल्पनिक ऐतिहासिक कहानियों को गढ़ने के लिए भी गहरी शोध और गहन वैचारिकता की आवश्यकता होती है, जिसका अमीश खास ख्याल रखते हैं.

साल 2020 में वेस्टलैंड प्रकाशन से प्रकाशित अमीश त्रिपाठी की किताब ‘Legend of Suheldev’ ने सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किए, जिसके बाद किताब को साल 2020 में ही हिंदी में भी प्रकाशित किया गया और इसका प्रकाशन ‘को’ ने किया. किताब को नाम दिया गया, ‘भारत का रक्षक महाराज : सुहेलदेव’ हिंदी में इसका अनुवाद धीरज कुमार अग्रवाल ने किया है, जो कि एक मीडिया प्रोफेशनल हैं. धीरज दर्जनों किताबों का हिंदी में अनुवाद कर चुके हैं.

अपनी किताबों के बारे में अमीश कहते हैं, “मेरी किताबें मेरे पास कैसे आती हैं, मेरी कल्पना में कैसे विकसित होती हैं, मैं उन्हें कैसे देखता हूं, नहीं पता, लेकिन मेरी सभी कहानियां भगवान शिव का आशिर्वाद हैं.” ‘सुहेलदेव’ एक ऐसे काल्पनिक राजा की कहानी है जो भारत की रक्षा के लिए तब लड़ा जब देश को सबसे ज़्यादा क्रूर विदेशी हमलावरों का ख़तरा था. राजा के नेतृत्व में सभी धर्मों के भारतीय लोग एक साथ आए और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़े. एक गौरवशाली जीत हासिल की. किताब के माध्यम से लेखक एक बात पर ज़ोर देते हैं, कि जब भारतीय एक रूप में एकजुट होते हैं, तो अजेय होते हैं.

यह सच है, कि पिछले 2000 वर्षों के इतिहास के विशाल खंड ने भयानक हिंसा की बाढ़ देखी, जिसने विश्व की सभी प्राचीन संस्कृतियों को मिटा दिया- बहुदेववादी रोम, रहस्यमय मिस्त्र और ग्रीस, ज़ोरास्ट्रियन ईरान, मूर्तिपूजक मध्य अमेरिका और ऐसी कई संस्कृतियां रही हैं, लेकिन एक स्वाभिमानी संस्कृति ने ख़ुद को टूटने या बदलने नहीं दिया… ये कई बार पीछे हटी, पर उन चुनिंदा सभ्यताओं में एक है जो आज गर्व से खड़ी है और ये सभ्यता है ‘भारत’.

भारत देश की भूमि पर जब हमलावर आए तो देश को ऐसे नायक और नायिकाओं की ज़रूरत थी, जो देश का नेतृत्व कर सकते थे… देशवासियों की रक्षा कर सकते थे… और जिनके पास लड़ने का साहस और संकल्प था, लेकिन ऐसे योद्धाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी विभाजित समाज को एकजुट करना. इसमें कोई संदेह नहीं कि देशवासियों के पास एक राष्ट्रीय चेतना निश्चित तौर पर थी, जिसके सबूत सदियों पुराने विष्णु पुराण में भी मिलते हैं. जैसे-जैसे इतिहास आगे बढ़ता है, हरिहर और बुक्का राय से लेकर महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, महाराणा रणजीत सिंह, ल्क्ष्मी बाई, भगत सिंह, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे अनगिनत महापुरुषों के नाम निकल कर सामने आते हैं. इन सभी के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती थी, वो यह थी कि अंदरूनी कलह और लड़ाई को कैसे रोका जाए.

‘सुहेलदेव’ किताब के माध्यम से अमीश त्रिपाठी कहते हैं, “दुखद है कि ऐसे कई नायक और नायिकाओं के नाम हमारी इतिहास की किताबों से गायब कर दिए गए, जो देश के लिए लड़े. आज हमें, पहले से कहीं ज़्यादा ऐसी कहानियां और ऐसे महापुरुषों को सुनने की ज़रूरत है, जिन्होंने हमें एकजुट किया और हमारे देश को क्रूर विदेशी हमलावरों से बचाने के लिए देश को प्रेरित किया. ‘सुहेलदेव’ ग्यारहवीं सदी के ऐसे ही तेजस्वी महाराजा की काल्पनिक कहानी है, जो वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है. मैं नहीं जानता कि सच्चाई क्या है, लेकिन मेरे लिए यही सच है कि वे भारतीय थे और मां भारती के गौरवशाली सपूत थे. मैं उनके वंश पर कुछ नहीं कहना चाहता. किताब में मैंने कहीं नहीं कहा कि वे किस वंश के थे.”

‘सुहेलदेव’ ग्यारहवीं सदी के ऐसे तेजस्वी राजा की काल्पनिक कहानी है, जो वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है.

अमीश त्रिपाठी की किताब ‘भारत का रक्षक महाराज : सुहेलदेव’ की कहानी कितनी भी काल्पनिक हो, लेकिन बेहद मनोरंजक और बांध कर रखने वाली है. किताब को पढ़ते हुए आपको पता चलेगा सुहेलदेव शिव भक्त है और उसकी अगुवाई में देश का एक बड़ा हिस्सा एकजुट हुआ और दुनिया के सबसे खूंखार और निर्दयी योद्धाओं से लैस मध्य एशिया के तुर्कों की सेना को पराजित किया. किताब ऐतिहासिक होने के साथ-साथ वीररस से ओत-प्रोत है. किताब की शुरुआत बेहद दिलचस्प तरीके से होती है, प्रस्तुक है किताब के पहले अध्याय से एक अंश, जिसे पढ़ने के बाद पूरी किताब को पढ़ने की इच्छा जागृत होती है-

पुस्तक अंश- ‘भारत का रक्षक महाराज: सुहेलदेव’
सोमनाथ, भारत, 1025 ईसवी

एक भारतीय योद्धा गुर्रा रहा था, उसके माथे पर नसें स्पष्ट रूप से उभरी हुई दिख रही थीं, शक्तिशाली भुजाएं फड़क रही थीं, हाथ पूरी ताकत से उसके तुर्क दुश्मन को मसल रहे थे. दुश्मन उसकी चौड़ी छाती पर लगातार वार किए जा रहा था, फिर भी उसने उसकी आंखों को ख़रोचने की कोशिश की. लेकिन तुर्क की ताकत लगभग खत्म हो चुकी थी और उसकी कमज़ोर कोशिशें उस भयंकर योद्धा पर मामूली असर डाल रही थीं, जो लगातार अपने से आदमी का गला बेरहमी से दबा रहा था.

उस तुर्क का चेहरा सुर्ख हो गया था और उसकी आंखें बाहर आ रही थीं. फिर उसकी जीभी बाहर निकली और वो बेजान हो गया. थोड़ी देर तक वो भारतीय योद्धा दुश्मन के गले को दबाता रहा, फिर उसके सिर को उठाकर पथरीली ज़मीन पर ज़ोर से पटक दिया और उसकी खोपड़ी तोड़ डाली. उसकी मौत पक्की करने के लिए. अचानक उसे थकान महसूस हुई और मरे हुए आदमी को छोड़कर वो लड़खड़ाता हुआ खड़ा हो गया.

इकहरे बदन वाला वो योद्धा खड़ा था. उसकी कसी हुई मांसपेशियां, चौड़े कंधे और चौड़ी छाती, पतली कमर और मांसल टांगों की वजह से उसका शरीर काफी गठीला दिखता था. उसके सांवले शरीर पर कटने-फटने के अनगिनत निशान दिख रहे थे. आज उसके शरीर पर कई और नए घाव बने थे. उसने अपने हाथों और पैरों को सीधा किया और शरीर के दर्द तथा थकान को कम करने की कोशिश की. थोड़ी दूरी पर घायल तुर्क को इस बीच मौका दिखा. अपनी पूरी ताकत लगाकर वो उठ खड़ा हुआ और उसने एक तलवार खींचकर उस भारतीय योद्धा पर कड़ा प्रहार किया. थकान और दर्द के बावजूद वो योद्धा अपनी स्वाभाविक फुर्ती और युद्ध कौशल के बलबूते बचने में सफल रहा. वो पीछे हटा और तलवार के वार से बाल-बाल बच गया. वार की रफ्तार से योद्धा तो बच गया लेकिन हमलावर का दाहिना हिस्सा उसके सामने आ गया. योद्धा ने उसके जबड़े पर ज़ोर से घूंसा मारकर उसे नीचे गिरा दिया. उस तुर्क के हाथ से तलवार छूटकर गिर गई.

तुर्क अवाक रह गया और उसने दोबारा उठने की कोशिश की. वो किसी तरह घुटनों के बल बैठ भर सका. इसी बीच योद्धा ने ज़मीन पर गिरी तलवार उठा ली और उसे ऊपर उठाकर तुर्क की गर्दन के पीछे से सीधा उसके दिल के पास आर-पार कर दिया. वो तुर्क वहीं मर गया.

योद्धा ने तलवार को टिकाकर थोड़ी सांस ली. वो बुरी तरह थका हुआ था, उसके शरीर से खून बह रहा था. लेकिन वो ये जानता था कि अभी उसे रुकना नहीं है. वो उत्तर भारत के श्रावस्ती का युवराज था. वो अपने सैनिकों के साथ गुजरात के पश्चिनी तट पर बसे हुए सोमनाथ की ओर आया था, जहां पूरे भारत के लोग प्रसिद्ध शिव मंदिर को तुर्क आक्रमणकारी महमूद गज़नवी से बचाने के लिए पहुंच रहे थे. उन्होंने तुर्कों की छोटी सेना के साथ युद्ध किया था. वो ये जानते थे कि तुर्कों की मुख्य सेना का आना अभी बाकी है. उन्हें ताकत जुटानी थी. एक बार फिर.

श्रावस्ती के इस भारतीय योद्धा ने अपने आप से कहा- उठो मल्लदेव, खड़े हो जाओ और आगे बढ़कर अपने दल को फिर से इकट्ठा करो. लेकिन वो वहीं खड़ा रहा. तुर्क सैनिक के शरीर में धंसी हुई तलवार के सहारे झुका रहा. वो ज़ोर-ज़ोर से सांस ले रहा था. अपने फेफड़ों में ऑक्सीजन पहुंचा रहा था. अपने थके हुए शरीर को थोड़ा और वक्त दे रहा था.

‘मेरे राजकुमार…’

मल्लदेव आवाज़ की ओर मुड़ा. उसे अपने चारों तरफ अपने वफादार साखी दिखे. सभी ज़मीन पर औंधे मुंह पड़े थे. सभी मृत. एक को छोड़कर बाकी सभी मर चुके थे. मल्लदेव ने उसके घावों की ओर- देखा और समझ गया कि ये भी कुछ ही देर में मौत की आगोश में चला जाएगा. लेकिन उसने अपने चेहरे से ये ज़ाहिर नहीं होने दिया.

‘उठो वसीम,’ मल्लदेव ने अपनी भारी और थकी हुई आवाज़ में कहा, ‘क्या तुम इन कुछ ज़ख्मों की वजह से सुस्त पड़ गए हो?’

वसीम धीमे से मुस्कुराया और अपने शरीर को ऐंठते हुए ज़ोर से खांसा, इस खांसी की वजह से बलगम के साथ खून उसके होंठ तक आ गया. मल्लदेव ने उसे आहिस्ते से थाम लिया और उसकी पीठ सहलाई.

जैसे ही उसकी खांसी बंद हुई, वसीम ने धीमे से कहा, ‘हमने उन तुर्कों को अच्छा सबक सिखाया… है ना?’

मल्लदेव ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘पक्के तौर पर.’

‘लेकिन… अभी और भी आएंगे…’ वसीम ने कहा.

मल्लदेव चुप रहा. वो जानता था कि वसीम सही कह रहा है.

‘महान राजकुमार… आपको अभी यहां से जाना चाहिए… मंदिर के गर्भ गृह की ओर… ये हमारी आख़िरी… रक्षा पंक्ति है.’ दर्द बर्दाश्त करते हुए वसीम ने ये शब्द फुसफुसाते हुए कहे. इसके बाद उसका शरीर अकड़ गया और शांत हो गया.

मल्लदेव ने वसीम के शरीर को उठाकर गले से लगाया और फिर उसे आहिस्ते से ज़मीन पर लिटा दिया. ‘मेरे मित्र, भारत माता तुम्हें आशीर्वाद दें और तुम्हारा बलिदान हमेशा अमर रहे.’

फिर मल्लदेव धीरे से उठा और धीमे से बोला, ‘ऊँ नम: शिवाय.’ इस मंत्र से उसे हमेशा शक्ति मिलती थी.

इसके बाद वो धीरे-धीरे लंगड़ाते हुए मुख्य मंदिर की ओर चल पड़ा. वसीम ने सही कहा था- आराम के लिए कोई वक्त नहीं था. उसका काम पूरा नहीं हुआ था. उसका जीवन अभी भी बचा था.

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