ना रात के अंधेरे का डर और ना बाढ़ का खौफ…नदी में नाव पर मच्छरदानी तानकर सोया शख्‍स, जानें वजह

अभिनव कुमार/दरभंगा. कहते हैं कि आपदा को चुनौती के रूप में लेने से बेहतर है उसे संभावनाओं में बदला जाए. ऐसी सोच हो तो क्या चिलचिलाती धूप और क्या बाढ़? ऐसा ही कुछ इन दिनों मिथिलांचल के बाढ़ प्रभावित इलाकों में देखने को मिल रहा है. दरभंगा जिले के हनुमान नगर प्रखंड क्षेत्र में इन दिनों बागमती नदी का जलस्तर बढ़ रहा है. इसमें तेज धाराएं चल रही हैं. लोगों को बाढ़ के खतरे का डर सताने लगा है. इन तमाम बातों से बेखबर यहां के मछुआरे नदी की तेज धाराओं में मछली पकड़ रहे हैं. जब काम नहीं रहता है तो नाव पर ही सो जाते हैं, वह भी मच्छरदानी तानकर.

मछुआरा बुधन सहनी बताते हैं कि मछली मारकर इसे बाजार में बेचते हैं. इसी से अभी परिवार चलता है. दिन भर में फिलहाल 4 से 5 किलो मछली पकड़ लेते हैं. जब बाढ़ और बढ़ेगी, तो मछली भी बढ़ेगी. बाढ़ के दिनों में 10 किलो तक रोजाना मछली पकड़ लेते हैं. इसी के कारण पूरे दिन इस नदी में नाव पर रहना पड़ता है. इसी पर खाना और इसी पर सोना होता है. वे कहते हैं कि घर से खाना आता है, यहीं पर खाते हैं और थोड़ा सा सो भी जाते हैं. बाकी दिनभर मछली पकड़ने का काम चलता रहता है.

छोटी-बड़ी सभी मछली पकड़ते हैं हम
बुधन सहनी बताते हैं कि कोसी के बाढ़ में छोटी-बड़ी सभी तरह की मछली आती हैं. फिलहाल देसी किस्म की छोटी मछली जाल में फंसती है. यही कारण है कि अभी दिनभर में 4 से 5 किलो ही मछली पकड़ पाते हैं. यह बाजार में 100 रुपये किलो के हिसाब से बेच लेते हैं. वे कहते हैं कि बाढ़ आती है तो मछली ज्यादा फंसती हैं. तब घर-द्वार छोड़कर बांध पर शरण लेनी पड़ती है. अपने परिवार के साथ मवेशियों को भी वहीं पर रखना पड़ता है. हरा चारा डूब जाने के कारण मवेशियों को सिर्फ भूसा ही मिल पाता है. बुधन की मानें तो बाढ़ में दुर्घटनाएं भी होती हैं, लेकिन जीने के लिए कुछ तो करना ही होगा.

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