अनुराधा सिंह की प्रेम कविताएं- ‘मैं वह स्वप्न हूं जिसे वह रोज अपनी नींद में देखता है’

हिन्दी कविता: समकालीन कवयित्रियों में अनुराधा सिंह एक स्थापित नाम हैं. उनका कविता संग्रह ‘ईश्वर नहीं नींद चाहिए’ भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ था और यह संग्रह काफी चर्चित रहा. उन्होंने उन्होंने तिब्बत के निर्वासित कवियों की कविताओं के अनुवाद भी किए हैं. यह अनुवाद ‘ल्हासा का लहू’ के रूप में प्रकाशित हुआ है. तिब्बतियों के विस्थापना के दर्द और वहां के लेखकों को जानने के लिए यह एक शानदार पुस्तक है. ‘बचा रहे स्पर्श’ भी उनकी उल्लेखनीय पुस्तक है.

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले की रहने वाली अनुराधा सिंह ने मनोविज्ञान और अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई की है. वर्तमान में वे मैनेजमेंट में बिजनेस कंयुनिकेशन पढ़ाती हैं. उन्हें शीला सिद्धान्तकर समान और हेमंत स्मृति समान से पुरस्कृत किया जा चुका है.

अनुराधा सिंह का एक और काव्य संग्रह ‘उत्सव का पुष्प नहीं हूं’ वाणी प्रकाशन से छपकर आया है. इस संग्रह में कुल 68 कविताएं हैं. कुछ प्रेम में डूबी कविताएं हैं तो कुछ जीवन दर्शन का बोध करती हैं. कुछ कविताओं में स्त्री का दर्द छलकता है तो कुछ में उसकी ललकार सुनी जा सकती है. ‘मटर की कीड़ा’ कविता जीवन दर्शन का सबसे शानदार उदाहरण है. ईश्वर ने प्रत्येक जीव के लिए उसका अपना संसार रचा है, लेकिन मनुष्य अपने लालच के कारण अपने संसार को ही नष्ट करके व्यर्थ के चक्करों में पड़ा रहता है-

मटर की बंद फली
उस एक तिहाई इंच के हरे कीड़े की
पूरी दुनिया है
पांच दाने हैं
अकूत सम्पदा जीवन के लिए

दस रुपये पाव, तुम्हारे और दुकानदार के
बीच का विनिमय है
मटर के कीड़े का अनुबंध तो ईश्वर से है
जिसने दाने के गर्भ में
आरोपित किया है उसे

तुम्हारे फली खोलते ही
उसे मजबूरन शामिल होना पड़ा है
तुम्हारे विपणन संसार में
वरना फली में
वह अपनी दुनिया का बाहक बाशिंदा था
उसकी औकात एक कीड़े से कहीं ज्यादा थी।

अनुराधा सिंह की कविताएं बहुत गहरे उतर कर लिखी गई हैं. पाठक के दिल में इनकी तासीर लम्बे समय तक बनी रहती हैं. उनका कहने का अंदाज जुदा है. और यही अंदाज पाठक के मन में उत्सुकता पैदा करता है. इसकी बानगी ‘ढंकने का काम’ में देखी जा सकती है-

ईश्वर ने
समन्दर को लहरों से ढंका
पृथ्वी को आकाश से
रात को नींद से
और अंत में हर दिखाई देती चीज को
हवा से ढंक दिया

स्त्री ने
भूख को रोटी से और
वासना को प्रेम से ढंका
अपने प्रेम को विवाह से ढंकने के बाद वह
धूप ओढ़कर एक बच्चे को दूध पिलाने लगी

पुरुष ने दुनिया से लौटकर देखा कि
स्त्री की आंखें अनावृत थीं
वह निराश हुआ और उसने
ईश्वर के पृथ्वी, आकाश, समन्दर और रात को
एक घर से ढंक दिया

फिर उसने
स्त्री के वक्ष को कुंचकी से ढंकने से पहले
उसके होने को अपने होने से ढंक दिया।

अनुराधा अपनी कविताओं के शिल्प पर बहुत काम करती हैं. उनकी कविताएं चिंतन की कविताएं हैं. ‘वेटिंग रूम में सोती स्त्री’ के माध्यम से अनुराधा ने स्वयंप्रभु स्त्री की एक संकल्पना की है-

हरे मखमली पत्तों पर
सहेजा
चम्पा का शीलवान फूल नहीं
अज्ञात रेगिस्तान में
जहां तहां भटकता
खुदमुख़्तार रेत का बगूला है
रेलवे के प्रतीक्षालय में
बेसुध सो रही औरत

मानो, अगली किसी ट्रेन का टिकट
उसके बस्ते में नहीं
मानो, इस शहर में कहीं जाना ही नहीं उसे
किसी घर में उसके दूर देस से लौट आने की
प्रतीक्षा नहीं हो रही
मानो, करवटें नहीं बदल रहा
कोई प्रेयस
कहीं उदास सफेद सिलवटों पर
चूल्हे पर खदबदाती दाल कहीं विकल नहीं कि
कोई आया
चमचा ही घुमा जाए
मानो, नहीं है किसी दफ्तर के
बेचैन आंकड़ों को
उसके एक सही का इंतज़ार
ऐसे सो रही है वह निश्चिन्त

सूरज भी चढ़ आया है आज इस तेज़ी से
कि आस पास बैठी औरतें
दिन चढ़े तक सोती इस औरत के
चाल चलन को लेकर हलकान होने लगी हैं
ऐसे तो यह
किसी रात प्रेम भी कर लेगी घर से बाहर
कैसी औरत है
इसे अपने थान पर पहुंचने की जल्दी नहीं
इसका कोई खूंटा है भी या नहीं
बिना नाथ पगहा सोती है क्या कोई औरत
ऐसे चित्त, ठीक पृथ्वी की छाती पर.

रेलवे के वेटिंग रूम में सोती हुई अकेली स्त्री
जवाबदेह नहीं
चाय की असमय पुकार की

वह औरतों के
अकारण रात भर घर से बाहर रह सकने
की अपील पर
पहला हस्ताक्षर है।

प्रेम का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है कि झूठे प्रेम में भी लेखिका सच्चा प्रेम खोज लेती है. ‘झूठे प्रेम के पक्ष में’ कविता में लेखिका कहती हैं कि झूठे प्रेम में सब मिथ्या नहीं होता-

गलत पते पहुंचे पत्रों के भी कुछ वाक्य
सही पते पहुंच जाते हैं
झूठे प्रेम में लिए आलिंगन
कतिपय सच्चे होते हैं
क्षण भर में ही भर सकती है आत्मा किसी को
चिर अंकवार में
एक रात के लिए प्रेम करने वाले भी
विषण्ण रातों में सहेजते हैं तकिये पर छूटा हुआ वह बाल
क्षण भर को जो हो वह भी तो कुछ प्रेम है।

पानी में शक्कर-सी लड़की

मैं उसकी मुट्ठी में बंद उंगली हूं
उसने थामा था सहारा देने के लिए
और मैं पसीने में तर
उसकी पकड़ से छूटने के लिए हूं बेचैन हूं

मैं उसके कंठ में थरथराती
वह आवाज
जिसे वह बोलना नहीं चाहता
मैं एक शब्द बनने के लिए तरस रही हूं
और उसके जहन में मेरा समूचा अर्थ कैद है

मैं वह स्वप्न हूं जिसे वह रोज अपनी नींद में देखता है
उसके जागते ही
एक धुंधले अघटित में तब्दील हो जाती हूं

लोग चेताते रहे
प्रेम न मिले तो व्यर्थ हो जायेगी लड़की
कौन बताता कि प्रेम होते ही
पानी में शक्कर-सी घुल जाएगी
हर घूंट में महसूस होगी
पर दिखेगी नहीं फिर कहीं लड़की।

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