मदन मोहन: नैना बरसे रिमझिम… नैनों में बदरा छाए… गाने बनाने वाले संगीतकार को पिता ने कर दिया था बेघर

अगर मदन मोहन के साथ ग़ज़ल नहीं बनायी तो फिर क्या काम किया. यह वह जुमला था जो उस दौर का हर फिल्‍म निर्माता-निर्देशक कहता था. वह दौर जिसे हम संगीतकार मदन मोहन का युग कहते हैं. मदन मोहन जिन्‍हें लता मंगेशकर गजलों का शहजादा कहती थीं तो अन्‍य संगीतकार उनकी इस कला के मुरीद थे. वे मदन मोहन जो दो साल की उम्र में अपने खिलौने के ड्रम को लेकर मार्च पास्ट कर रही इराकी पुलिस दल में शामिल हो गए थे. वे जो फौज में रहे लेकिन मन तो संगीत में रमा था. उन्‍होंने संगीत में भी फौजी अनुशासन कायम रखा. ऐसा अनुशासन की साजिंदों द्वारा सुर में न बजाने पर वे आक्रोशित हो जाया करते थे.

25 जून 1924 को बगदाद में जन्मे मदन मोहन का पूरा नाम मदन मोहन कोहली था. उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल कोहली इराकी पुलिस बलों में अकाउंटेंट जनरल थे. उसी समय नन्‍हे मदन मोहन ग्रामोफोन के रिकार्ड्स सुना करते थे और पढ़ना नहीं जानने के बाद भी पिता के मांगने पर वे सही रिकार्ड निकाल कर ले आते थे. यह दूसरे लोगों के लिए आश्चर्य का विषय होता था. संगीत शोधकर्ता विश्वास नेरुरकर ने ‘मदन मोहन: अल्टीमेट मेलोडीज’ में इस किस्‍से का भी उल्‍लेख किया है कि दूसरे जन्‍म दिन पर पिता ने मदन मोहन को ड्रम गिफ्ट किया था. तब इराकी पुलिस बैंड मार्च पास्‍ट कर मदन मोहन के घर के सामने से गुजर रहा था तो मदन मोहन भी अपने ड्रम को लेकर मार्च पास्‍ट में शामिल हो गए. जब घर में बालक नहीं मिला तो माता-पिता ने खोजबीन शुरू की. कई घंटों पर नन्‍हा मदन मोहन पुलिस डिपो में मिला.

ये किस्‍से असल में संगीत के बादशाह बनने की बुनियाद बताते हैं. इराक से मदन मोहन के पिता पहले लाहौर और फिर मुंबई आ गए. उन्‍होंने हिमांशु राय के साथ बॉम्‍बे टॉकीज की स्‍थापना की. मगर मदन मोहन को उन्‍होंने पहले आर्मी स्‍कूल भेजा और उसकी संगीत की रूचियों को दरकिनार कर सेना में भर्ती करवा दिया. मगर मदन मोहन भी फौज में कब तक टिक सकते थे? कब तक हाथों में साज की जगह बंदूक शोभा देती? उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में सेना छोड़ दी और अपनी संगीत रुचियों को आगे बढ़ाने के लिए मुंबई लौट आए. 1946 में उन्‍होंने ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ में बतौर प्रोग्राम असिस्टेंट काम शुरू किया. साल भर में ही समझ आया कि यह नौकरी उनके संगीत के शौक में बाधा है तो वे उसे छोड़ कर मुंबई आ गए. इस बात से पिता राय बहादुर चुन्नीलाल खफा हो गए. उन्होंने बेटे को घर में नहीं रहने दिया. पहली फिल्‍म ‘आंखें’ रिलीज होने के बाद मदन मोहन ने अपने पिता राय बहादुर चुन्नीलाल को निजी शो देखने बुलाया. पिता खामोशी से फिल्‍म देखते रहे, बेटे का संगीत सुनते रहे.

फिल्‍म खत्‍म होने के बाद उनकी आंखों में आंसू थे. जिस व्‍यक्ति ने जीवन में कभी पश्‍चाताप नहीं किया था उन्‍होंने फख्र और ग्‍लानि से कहा कि पिता ने अपने बेटे को गलत समझा. बेटे ने सही कॅरियर चुना है. कभी संगीत के लिए बेटे को घर से बाहर निकालने वाले पिता ने मदन मोहन की संगीत की काबिलियत को खूब सराहा. इस घटना के दो माह बाद पिता का देहांत हो गया लेकिन इसके बाद मदन मोहन ने खुद को संगीत तैयार करने में झोंक दिया.

‘आंखें’ से जुड़ा एक संस्‍मरण और है. गायिका लता मंगेशकर ने भी मदन मोहन की बतौर संगीतकार इस पहली फिल्‍म में गाने से मना कर दिया था क्‍योंकि उन्‍हें लगता था कि बॉम्‍बे टॉकीज के मालिक का बेटा शौक में संगीतकार बन गया है, वह गुणी नहीं है. लेकिन ‘आंखें’ में दिए संगीत से लता मंगेशकर का भ्रम टूटा और उसके बाद मदन मोहन ने उन्‍हें अपनी बहन बना लिया. इस एक फिल्‍म के बाद मदन मोहन की हर फिल्‍म में लता का गाना जरूर होता था. यहां तक कि 2004 में मदन मोहन की धुनों पर ‘वीर जारा’ का संगीत तैयार हुआ तो गीत लता ने ही गाए.

इस तरह 1950 में देवेंद्र गोयल की फिल्‍म ‘आंखें’ से मदन मोहन का फिल्‍मी सफर शुरू हुआ था. 1952 में फिल्‍म ‘खूबसूरत’ मदन मोहन ने तलत महमूद से गजल ‘मोहब्बत में कशिश होगी तो एक दिन तुमको पा लेंगे’ गवाई थी. ‘अदालत’ की गजल ‘यूं हसरतों के दाग मुहब्बत में धो लिए’ तक मदन मोहन का संगीत गजलों के लिए सबसे ज्‍यादा पंसद किया जाने लगा. इस बीच 1953 में फिल्‍म ‘दाना पानी’ भी आई जिसमें मदन मोहन ने गाना बंद कर चुकी बेगम अख्तर को कैफ इरफानी की गजल ‘ऐ इश्क़ मुझे और तो कुछ याद नहीं है’ गाने के लिए राजी कर लिया था. बेगम अख्‍तर का युवा मदन मोहन की आरजू पूरी करने का अर्थ केवल यह है कि मदन मोहन का संगीत इतना बेहतर होता था कि उसके आगे बड़े से बड़े गायक भी अपने फैसले दरकिनार कर देते थे. और जब गजलों और मदन मोहन के संगीत का जिक्र करते हैं तो हमें ‘मौसम’ फिल्म की ‘रुके-रुके से क़दम रुक के बार-बार चले’, ‘अनपढ़’ की ‘आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे’, ‘दस्तक’ की गजल ‘हम हैं मता-ए-कूचा-औ-बाजार की तरह’, फिल्म ‘जहांआरा’ की ‘वो चुप रहें तो मेरे दिल के दाग जलते हैं’ ‘अदालत’ फिल्‍म की ‘उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते’ और ‘जाना था हमसे दूर बहाने बना लिए’ और ‘अनपढ़’ की ‘है इसी में प्यार की आबरू वो जफ़ा करे मैं वफा करूं’ की याद आती है.

एक दौर ऐसा भी आया जब मदन मोहन के गाने तो हिट हुए मगर फिल्‍में चल नहीं पाई. मायूसी के उसी दौर में 1956 में आई ‘भाई-भाई’ फिल्‍म का गाना ‘ऐ दिल मुझे बता दे तू किस पे आ गया है’ ऐसा छाया कि उसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. ‘लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो’, ‘नैना बरसे रिमझिम’, ‘नैनों में बदरा छाए बिजली सी चमके हाय’, ‘तू जहां जहां चलेगा, मेरा साया साथ होगा’, ‘मस्‍ती में छेड़ के तराना कोई दिल का’ , ‘जरा सी आहट होती है तो दिल सोचता है’, ‘तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्‍या है’, ‘मैं ये सोच के उसके दर से उठा था’ जैसे गाने मदन मोहन के संगीत के कारण खूब पसंद किए गए.

हालांकि, यह विडंबना ही कही जानी चाहिए कि इतने विलक्षण संगीतकार को एक बार भी फिल्मफेयर पुरस्कार नहीं मिला. जबकि 1970 में फिल्‍म ‘दस्‍तक’ के संगीत निर्देशन लिए राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिला था. कुछ सालों बाद काम की कमी भी हो गई. अपेक्षित प्रतिसाद नहीं मिलने के बाद वे अवसाद के शिकार हो गए. उन्होंने शराब पीना शुरू कर दिया. महज 51 वर्ष की आयु में 15 जुलाई 1975 को उनका निधन हो गया. कहना न होगा उनके निधन को कुछ बरस बाद 51 वर्ष हो जाएंगे लेकिन उनके संगीत कर ताजगी आज भी ज्‍यों की त्‍यों हैं. श्रोताओं को मुग्‍ध करती हुई, उन्हें अलौकिक महसूस करवाती हुई.

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