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हाइलाइट्स

लालू यादव ने एक बड़े तबके के बीच अफसरशाही की धौंस खत्म की.
लालू ने बताया कि जनता मालिक है, अफसरों को भी जनता के बीच जाना पड़ा.
लालू प्रसाद यादव ने खांटीपन से औपचारिकता की फरमे को तोड़ा.

लालू प्रसाद यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी माता जी को ये खुशखबरी देने गए. भोजपुरी में उनसे कहा कि वे मुख्यमंत्री बन गए हैं. भोली-भाली माता जी को पता नहीं था ये क्या होता है. लालू प्रसाद ने उनकी समझ के हिसाब इस पद को कंपेयर करते हुए समझाया- “इ जे हथुआ महराज बाड़न उनको से बड़.” (हथुआ महाराज से भी बड़ा पद है.)  फिर भी माता जी को संतोष नहीं हुआ. उन्होंने कहा- “अच्छा ठीक बा जाय दे, लेकिन तहरा सरकारी नौकरी ना नु मिलल.” (ठीक है, लेकिन तुमको सरकारी नौकरी तो नहीं मिली.)

बिहार की राजनीति के बारे में जानने वाले बहुत से लोग मां-बेटे के इस संवाद के बारे में जानते ही होंगे. लेकिन पत्रकार संतोष सिंह ने ‘लालू नीतीश का बिहार – कितना राज कितना काज’ नाम की अपनी किताब में लालू यादव की अब तक की राजनीतिक यात्रा का विस्तार से वर्णन किया है.

पहले अंग्रेजी में छपी इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद वाणी प्रकाशन से आया है. अनुवाद कल्पना शर्मा ने किया है. इस किताब लेखक ने लालू प्रसाद यादव से जुड़े और उनके समकालीन बहुत सारे लोगों से बातचीत-शोध के बाद तथ्य देने का दावा किया है. कई महत्वपूर्ण अंग्रेजी अखबारों से जुड़े रहे लेखन ने अपनी पत्रकारिता के दौरान खुद देखे तथ्यों को भी इसमे शामिल किया है. उन्होंने छात्र राजनीति से संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौर में उभरे लालू प्रसाद यादव राजनीतिक यात्रा को अच्छे से लिखा है.

लालू का लोहा
खास बात ये है कि उन्होंने बार-बार ये रेखांकित किया है कि कैसे लालू प्रसाद ने वंचित और पिछड़ों के डर को खत्म किया. लेखक ने उनके कामकाज खासतौर से ‘चरवाहा विद्यालय’ जैसे उनके कॉनसेप्ट को लागू करने को बहुत अच्छे से लिखा है. ‘लालू का लोहा’ नाम के पहले अध्याय में ही लेखक ने ये बताया है कि लालू प्रसाद यादव ने कैसे रेडियो के कैरेक्टर लोहा सिंह के डॉयलॉग्स से अपना अंदाज तैयार किया था. बाद में इस अंदाज के जरिए वे बड़ी-सी बड़ी बात बहुत सरलता से कह दिया करते रहे.

करिश्माई लालू
‘करिश्माई लालू’ भी इस किताब का एक अध्याय है. इसमें उनके अंदाज के करिश्मे का खास तौर से जिक्र किया गया है. इसी में लिखा है कि लालू प्रसाद को प्रोटोकॉल की कोई परवाह नहीं होती थी. मुख्यमंत्री बनने के थोड़े ही दिनों बाद रोहतास से डेहरी लौटते समय उन्होंने एक दफा अचानक गाड़ी रुकवा दी. साथ चल रहे एक पुलिस अफसर के हवाले से उन्होंने लिखा है कि प्रोटोकॉल के सारे लोग हैरान परेशान थे. अचानक किसी डोम जाति के व्यक्ति की झोपड़ी पर पहुंच कर हांक लगाई. झोपड़ी के अंदर से पूछा गया कौन है. इस पर लालू ने कहा – ललुआ, लालू यादव. इतना सुन कर अंदर से कोई बुजुर्ग निकला और लालू प्रसाद से गले लग गया. इससे पहले ऐसे किसी आम आदमी को सीएम से गले मिलते नहीं देखा गया था. लेखक ने ये भी लिखा है कि मुलायम सिंह यादव ने भी बहुत कुछ अपने तरीके से किया लेकिन खांटीपन लालू ने अपना ही एक नया तरीका इजाद किया.

OBC और दलित स्वाभिमान का अभिषेक
लालू प्रसाद यादव के अंदाज का जिक्र करते हुए किताब में लिखा है कि शरीर से लाचार कोई व्यक्ति लालू के यहां पहुंचा. किसी की मदद से चल रहे इस व्यक्ति के कपड़ों से बदबू आ रही थी. लालू प्रसाद ने उसे देख कर अपने कमरे में गए. वहां से साबुन लाए, हैंडपंप से पानी निकाल कर उस व्यक्ति को नहाने के लिए कहा. खाना दिया और तब पूछा कि वो क्यों आया है. इस पर उसने कहा नौकरी चाहिए. फिर ये सोच कर हँसे कि लोगों को लगता है कि सीएम सबको नौकरी दे सकता है. बहरहाल उन्होंने उस समय के विधान परिषद के अध्यक्ष जाबिर हुसैन से उस व्यक्ति के लिए कुछ करने को कहा.

बच्चे साफ-सुथरे रहें इसके लिए भी लालू प्रसाद ने अभियान चलाया. वे टैंकर लेकर गरीब इलाकों में पहुंच जाते. उनके साथ पटना के जिला अधिकारी को भी रहना पड़ता. टैंकर से पानी की बारिश की जाती और सरकारी अफसरों को बच्चों के बालों में कंघी करते देखा जाता. लालू प्रसाद यादव जनता के इन लोगों को ‘मेरे मालिकों’ कहा करते. इस सब में तालियां बजतीं. लोगों ने पहली बार सरकारी अफसरों को अपने दरवाजे पर आते देखा था. पुस्तक के लेखक ने इसे ओबीसी और दलित स्वाभिमान का अभिषेक कहा है.

चरवाहा विद्यालय
लालू प्रसाद यादव ने उस समाज को देखा था, जहां अलग-अलग जातियों के लोग पुस्तैनी तौर-तरीके अपनाते हुए किसी तरह जीवन यापन करते थे. कोई जाति चूहे मार कर अपना पेट भरती, तो कोई जाति जानवरों को चराना ही अपना काम मानती थी. उन्होंने इन्हें उनके पेशे से ही संबोधित करना शुरु कर दिया. घोंघा पकड़ने वालो, चूहा मारने वालो, भैंस चराने वालो अपने बच्चों को स्कूल भेजो. इसके लिए उन्होंने ऐसे स्कूल बनवाने को कहा जो इनके काम-काज पर असर डाले बगैर उस समय पढ़ाए जब पढ़ने वाले खाली हों. इसी के तहत प्रौढ़ शिक्षा निदेशक से ऐसे विद्यालय पर काम करने को कहा. एक समय पटना और आसपास में 89 ‘चरवाहा विद्यालय’ चलने लगे. हालांकि ये योजना अपनी खामियों के कारण लंबे समय तक नहीं चल सकी. लेकिन इसे समझा जाय तो दरअसल ये शिक्षा के लिए बहुत उपयुक्त और जरूरी काम था.

लालू का असर
बिहार के जाने-माने पत्रकार श्रीकांत प्रत्यूष के हवाले से संतोष सिंह ने लिखा है कि एक बार लालू नाम के एक डकैत पर वे स्टोरी करने निकले. ये डकैत खुद को बिहार सरकार कहा करता था. इस चक्कर में डकैत ने प्रत्युष और उनकी टीम को ही बंधक बना लिया. बचने के लिए प्रत्युष ने कहा कि वे तो लालू प्रसाद यादव के कहने पर ये पता करने आए हैं कि आखिर किन हालात में लालू (डकैत लालू) को हथियार उठाना पड़ा. इस पर डकैत ने कहा कि तो लालू यादव से बात कराओ. किसी तरह प्रत्युष ने किसी वायरलेस के जरिए लालू यादव से डकैत की बात कराई और लालू के कहने पर डकैत ने उन्हें छोड़ दिया. इसके आगे प्रत्युष लेखक को ये भी बताते हैं – “बाद में पटना में लालू जब मुझसे मिले तो कहा देखा न, मैंने तुमको बचा लिया. “

बीस अध्यायों वाली पुस्तक में नीतीश कुमार का भी पर्याप्त जिक्र है, लेकिन जिस तरह से लालू की कहानियां शायद रोचक होने के कारण ज्यादा भाती हैं. साथ ही इसमें बिहार की राजनीति में परिवर्तन करने वाले दूसरे नेताओं और उनके असर का भी बेहतरीन तरीके से उल्लेख किया गया है. खास बात ये है कि लेखक ने अपने पत्रकारिता धर्म के मुताबिक ज्यादातर कहानियां नेताओं और उनसे सीधे जुड़े अफसरों-पत्रकारों के हवाले से ही ली हैं. या फिर संबंधित स्थान पर जाकर वहां के लोगों से बातचीत से सूचनाओं पर शोध किया है.

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