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मणि कौल का सिनेमा: रजत पट पर स्‍वर्णिम साहित्‍य रचना | – News in Hindi

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जब भी इंतजार शब्‍द सुनता या पढ़ता हूं तो मुझे बरबस मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ याद आ जाती है. इसके समानांतर याद आती है मणि कौल की फिल्‍म ‘उसकी रोटी’. यह कहना मुश्किल है कि मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ पढ़ते वक्‍त इंतजार और स्‍त्री मन की बारीकियों को अधिक गहराई से महसूस किया या मणि कौल की फिल्‍म को देखते वक्‍त. बल्कि यूं कहना चाहिए कि मणि कौल तक आते-आते मोहन राकेश की कहानी सिनेमा की कविता बन गई. ऐसी कविता जिसे ठहर कर पढ़ेंगे/सुनेंगे तो उसके दृश्‍य आपको शब्‍दों के पार ले जाएंगे. फिल्‍म के अधिकांश हिस्‍से में शब्‍द नहीं हैं, वहां ध्‍वनियां हैं जो मन के भावों को व्‍यक्‍त करती हैं. ऐसी ही है यह फिल्‍म जिसके संवाद तो ठीक ध्‍वनियां हमसे अधिक बात करती हैं, वे ध्‍वनियां जो हमारे आसपास रोज गूंजती है मगर हम उन्‍हें अनसुना कर देते हैं. मणि कौल उन ध्‍वनियों से कथा को मायने देते हैं, आगे बढ़ाते है और ‘उसकी रोटी’ मोहन राकेश की कहानी से आगे पर्दे पर मणि कौल की कविता बन जाती है.

हिंदी फिल्‍म जगत जिस समानांतर सिनेमा की राह चला है उसमें मणि कौल का स्‍थान प्रमुख हैं. एफटीआईआई से स्नातक और ऋत्विक घटक के शिष्य मणि कौल ने महज 24 वर्ष की उम्र में ‘उसकी रोटी’ फिल्म बनाई और समानांतर सिनेमा की नई इबारत लिखनी शुरू की. फिल्म की कहानी सुच्चा सिंह और उसकी पत्नी बालो के जीवन पर केंद्रित है. इस फिल्‍म को रचने में मणि कौल ने श्‍वेत-श्‍याम को पूरी विविधता के साथ प्रस्‍तुत किया है. आज के इस समय में जब शोर ही अभिव्‍यक्ति का पर्याय मान लिया गया है तब सन्‍नाटे और ध्‍वनियों का तालमेल कथा को तो आगे बढ़ाता ही है दर्शकों को रोक कर रखता है. ठहरने पर मजबूर करता है. वन मिनट रीड के दौर में यह ऐसा सिनेमा है जहां एक संवाद के आने की प्रतीक्षा खास तरह का प्रभाव उत्‍पन्‍न करती है. रफ्तार होती जिंदगी में जब ध्‍वनियां अनचिन्‍ही कर दी गई हैं तब ‘उसकी रोटी’ जैसी फिल्‍म हमें ध्‍वनियों को समझने का अभ्‍यास करवाती हैं. या यूं समझिए कि यह समय के साथ रहना सिखाती हैं. ठीक इस सिद्धांत की तरह कि शब्‍द तब ही हो जब वे मौन को तोड़ें. अन्‍यथा तो कामकाज की ध्‍वनियां, पानी, बर्तन, हवा, गाड़ी की आवाजें ही संवाद स्‍थापित करने में सक्षम होती हैं. ये ध्‍वनियां ही तो स्‍त्री मन विकटता भी जताती हैं और भीतरी उथलपुथल जाहिर करती हैं.

एक साक्षात्कार में स्‍वयं मणि कौल ने कहा है कि यदि एक टेबल पर रखे अमरूद को ट्रायपॉड पर रखा कैमरा शूट कर रहा हो तो टेबल, अमरूद, और कैमरा सभी स्थिर हैं एकमात्र जो चलायमान है वह है समय. मूमेंट ही मूवमेंट है. मुझे लगता है, मणि कौल की फिल्‍मों में मूमेंट ही मूवमेंट है. यहां सन्‍नाटा ही ध्‍वनियां गढ़ता है और ध्‍वनियां हमारे भीतर सन्‍नाटा बुनती है.

यह बात और है कि फिल्‍म की गति को लेकर मणि कौल हमेशा आलोचना के केंद्र में रहे. यहां कला समीक्षक प्रयाग शुक्‍ल की यह बात एकदम उपयुक्‍त जान पड़ती है कि जब ‘उसकी रोटी’ फिल्म रिलीज हुई थी तो उसे यह कहकर बहुतों के द्वारा कोसा गया था कि वह अत्यंत शिथिल और उबाऊ है, कि उसके ‘विलंबित लय’ वाले संवाद अत्यंत असहज लगते हैं. तब इस बात को भुला दिया गया था कि संवादों की इस प्रकार की अदायगी का अपना अर्थ और मर्म है. दुर्भाग्यवश मणि कौल के सिनेमा को लेकर यह बात इतनी बार दुहराई गई कि आम दर्शक का ध्यान तो उसकी ओर से कटता ही गया, जिन्हें हम प्रबुद्ध दर्शक कहेंगे वे भी उनके सिनेमा को लेकर उस तरह उत्साहित नहीं हुए, जिस तरह कि होना चाहिए. उदयन वाजपेयी की एक पुस्तक ‘अभेद आकाश’ जरूर एक अपवाद की तरह सामने आई और कुछ कवियों-लेखकों सिने-प्रेमियों की वे टिप्पणियां भी जो मणि कौल के सिनेमा को ‘खारिज’ करने की जगह उसकी खोज-परक यात्रा को समझने का यत्न करती हुई मालूम पड़ीं.

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मणि कौल ने अपनी अधिकांश फिल्मों को हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर ही केंद्रित किया हैं. ‘उसकी रोटी’ से शुरू हुआ सफर मोहन राकेश की कृति पर ‘आषाढ़ का एक दिन’, विजयदान देथा की रचना पर ‘दुविधा’, मुक्तिबोध की रचना पर ‘सतह से उठता आदमी’, विजय तेंदुलकर के नाटक पर ‘घासीराम कोतवाल’; फ्योदोर दोस्तोव्स्की की रचना पर ‘इडियट’ तथा विनोद कुमार शुक्ल की रचना पर ‘नौकर की कमीज’ तक पहुंचता है. एक लेखक की कृति पर उसकी उपस्थित में फिल्‍म बनाना एक खास तरह का जोखिम भी होता है और सृजन का अनूठा अवसर भी देता है.

जब मैं कहता हूं कि मोहन राकेश की ‘उसकी रोटी’ कहानी और मणि कौल की फिल्‍म ‘उसकी कहानी’ की विषय वस्‍तु एक है मगर दोनों मुझ में अलग-अलग आकाश गढ़ती हैं. तब ख्‍याल आता है कि जब एक लेखक ने अपनी कृति को मणि कौल के नजरिए से पर्दे पर देखा होगा तो क्‍या अनुभव किया होगा? इस सवाल का उत्‍तर ‘समालोचन’ के लिए दिए साक्षात्‍कार में विनोद कुमार शुक्‍ल से मिलता है. उनके उपन्‍यास ‘नौकर की कमीज’ पर मणि कौल ने फिल्म बनाई है. जब फिल्‍म बन रही थी तब विनोद कुमार शुक्‍ल भी साथ थे. वे बताते हैं कि तब बनती हुई फिल्म का दर्शक था. अपने गढ़े हुए पात्र संतू को मैं देख रहा था. बाद में शूटिंग के दौरान मुझे लगने लगा कि मैंने इसी संतू को देख कर उपन्यास के संतू को लिखा है. दोनों संतू भी एक दूसरे को जान गए यानी उपन्यास के और फिल्म के संतू. यह जुड़वां की तरह दूसरी रचना थी. पर चचेरे की तरह. शक्ल-सूरत में कहीं मेल था कहीं मेल नहीं भी था.

विनोद कुमार शुक्‍ल कहते हैं कि मुझसे  बहुत पूछा गया कि उपन्यास के साथ न्याय हुआ या नहीं. मैं मानता हूं फिल्म मणिकौल की अपनी रचना है. उपन्यास मेरी. और रचना करना न्याय करना है, अपराध नहीं. मेरे लिए फिल्म को बनते हुए देखना उपन्यास को बनते हुए देखना था. मणि कौल ने उपन्यास को बनाया था. उपन्यास को टूटते हुए मैंने नहीं देखा.एक लेखक यदि इस तरह संतुष्‍ट हो जाए तो समझा जाना चाहिए कि किस ऊंचाई का सिनेमा रचा गया है.

मणि कौल पुणे के फिल्म संस्थान में ऋत्विक घटक के छात्र थे. उन्होंने पहले अभिनय और फिर निर्देशन का कोर्स किया और निर्देशन को ही अपना रचनात्मक जुनून बनाया. मणि कौल जिस एफटीटीआई में पढ़े हैं उसी संस्‍थान के छात्र रहे सुदीप सोहनी लिखते हैं कि मणि कौल स्पेस और टाइम के फिल्मकार हैं. उनकी फिल्में देखने के लिए धैर्य चाहती हैं. वे खुद इस ‘देखना’ पर हमेशा तवज्जो देते रहे. पर उनके लिए कभी भी सिनेमा दृश्य माध्यम नहीं रहा बल्कि वो इसे ‘टेम्पोरल मीडियम’ कहते थे. जो समय के सापेक्ष चल रहा. दृश्यों में, ध्वनि में, गति में, लय में और अपने परिवेश में- जिसमें तात्कालिकता पूरी स्वच्छंदता के साथ उपस्थित रह सकती है. इस विचार के आसपास भी अगर हम कुछ चहल-कदमी करें तो जटिल लगने वाली और समझ में न आने वाली मणि की फिल्मों के भीतर जाने का दरवाज़ा यहां से खुलता है.

सुदीप जब लिखते हैं कि जिस देश में लगभग हर तरह का विचार और कलाएं सदियों से पनप रही थीं और अपने आधुनिक रूप में समृद्ध थीं; वहीं सिनेमा को रस और विचार से अलग केवल ‘एक्सप्लोर’ करने और ‘इंटरप्रेट’ करने का मौका देने के बावजूद मणि कौल आम दर्शकों द्वारा नकार दिए गए, तो हमें हमारे सिनेमा समाज की विडंबना समझ आती है.

बहरहाल, मणि कौल का सिनेमा हमें ठहरने को मजबूर करता है. जैसे किसी कहानी या कविता की पंक्ति हमें रूकने पर विवश कर देती है. आज मणि कौल और उनके सिनेमा का जिक्र खासतौर से इसलिए कि आज उनकी पुण्‍यतिथि है. 25 दिसंबर 1944 को राजस्थान के जोधपुर जन्‍मे मणि कौल का निधन 6 जुलाई 2011 को गुड़गांव में निधन हुआ था. बेशक वे आज नहीं है मगर उनकी फिल्‍में सिनेमा विद्यार्थियों के लिए सबक हैं तो फिल्‍म प्रेमियों के लिए इंसानी मनोभावों को पर्दे पर देखने का दिलचस्‍प वितान.

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