ईरान का शंघाई संगठन से जुड़ना भारत के लिए क्यों होगा एक कठिन चुनौती?

हाइलाइट्स

शंघाई सहयोग संगठन में ईरान शामिल हो गया है जिसका झुकाव चीन की ओर है.
रूस और ईरान दोनों ही चीन की मुद्रा युआन में व्यवसाय करने पर जोर दे रहे हैं.
भारत के लिए पश्चिमी देश और एससीओ के बीच संतुलन कायम करना चुनौती होगी.

शंघाई शिखर सहयोग संगठन (एससीओ) में अब ईरान भी शामिल हो गया है. हाल ही में संगठन की वर्चुअल मीटिंग में कई बड़ी घटनाएं देखने को मिली. इसमे सबसे प्रमुख रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का संबोधन था जो कि पिछले महीने वैगनर समूह की बगावत के प्रकरण बाद से उनकी पहली अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति थी. संगठन की इस बैठक से कुछ चीजें भी भारत केलिए साफ हो रही है. यह सम्मेलन भारत के लिए कुछ अवसर और कुछ चुनौतियां भी लाया है भविष्य में भारत की कूटनीतिक कुशलता का परीक्षण होना तय है. क्योंकि में भारत को बहुत ही संभलकर रूस आदि से सहयोग लेते हुए पश्चिमी देशों के साथ तलामेल कायम रखने की जरूरत पड़ेगी.

किस तरह का संगठन माना जाता है
शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का निर्माम साल 2001 में हुआ था. शुरू से ही इस चीन और रूस के पश्चिम रोधी खेमे के तौर पर देखा जाता रहा है. आज इस संगठन में भारत पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, और उज्बेकिस्तान हैं. संगठन में चीन का दाखिला पश्चिमी देश खास तौर पर अमेरिका के लिए एक चिंता की बात हो सकता है.

शक्ति संतुलन की जरूरत?
इस संगठन में एक तरफ चीन है जो पाकिस्तान का खुल कर समर्थन करता है और भारत से उसकी दूरी जाहिर है. वहीं दूसरी तरफ भारत का दोस्त रूस है जिसका झुकाव चीन की ओर ज्यादा हो रहा है और ईरान की इस संगठन में लाने का श्रेय भी उसी पर है. इतना ही नही रूस के समर्थक पड़ोसी बेलारूस ने भी अगले साल संगठन से जुड़ने के लिए आवेदन दे रखा है.

अंतरराष्ट्रीय मंच पर पुतिन
इस सम्मेलन  को लेकर अंतरराष्ट्रीय लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण पुतिन का सम्बधन है.  उन्होंने कहा कि रूस सभी तरह के बाहरी पाबंदियों, दबाव, उकसावों आदि का सख्ती से मुकाबला करता है. पुतिन के बारे में कहा जा रहा था कि वैगनर प्रकरण के बाद से उनके गायब होने पर कई तरह बातें चल रही थीं, लेकिन उन्होंने इस पर विराम दे दिया.

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रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शंघाई सहयोग संगठन के मंच पर चीन की मुद्रा युआन में व्यापार करने पर खुशी जाहिर की. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)

एक चिंता की बात
पुतिन ने एससीओ के देशों के बीच में स्थानीय मुद्रा में व्यापार के समझौते का समर्थन किया, जिसकी पश्चिमी पाबंदियों के बीच आज रूस को ज्यादा जरूरत है.  पुतिन ने कहा कि रूस चीन के बीच का 80 फीसद व्यापार रूसी मुद्रा रुबल और चीनी मुद्रा युआन में होता है. उन्होंने संगठन के बाकी देशों से भी ऐसा ही करने की गुजारिश की. लेकिन इससे भारत के लिए एक अलग तरह की चुनौती खड़ी हो जाती है.

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तेल खरीद की मुद्रा?
दरअसल भारत अभी तक रूस से कच्चा तेल आयात करवा रहा था. लेकिन इसके लिए रूस को अब यह सौदा रुपये या रूबल से करने में दिक्कत आ रही है. अगर वह रुपये में यह सौदा करता है तो वह भारत से ज्यादा इतना ज्यादा व्यापार करता नहीं है ऐसे में ज्यादा रुपये से उसका नुकसान होगा. प्रतिबंधों की वजह से डॉलर में सौदा मुफीद नहीं है ऐसे में युआन ही दोनों  देशों के लिए उचित होगी. लेकिन इससे चीन को फायदा होगा जो भारत के ना चाहते हुए भी हो रहा है.

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ईरान के शामिल होने और रूस के रवैये से आने वाले समय में चीनी मुद्रा युआन को बढ़ावा मिलेगा जो भारत के लिए फायदेमंद नहीं होगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)

ईरान का फायदा भी हो सकता है
इन हालात के बाद भै ईरान की एंट्री भी भारत के लिए मिली जुली है क्योंकि ईरान भी द्विपक्षीय व्यापार के लिए लेनदेन युआन का समर्थन तो कर रहा है, लेकिन भारत और ईरान के द्विपक्षीय संबंध बहुत अच्छे हैं. भारत ऐसे में संगठन में अपनी उपस्थिति को लेकर संतुलन कैसे बनाता यह देखना होगा.

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मंच पर आतंकवाद का समर्थन करने वालों की आलोचना करते हुए दुनिया को आतंकवाद के खतरों की याद दिलाई थी. इस बैठक में पाकिस्तान के प्रधानंत्री शहबाज शरीफ ने भी शिरकत की थी. मोदी ने अपील की कि आंतक को प्रयोजित करने वालों की संगठन को आलोचना करनी चाहिए. लेकिन चीन को साथ व्यापारिक संबंध कम होने के कारण भारत को युआन में व्यापार नुकासन दे सकता है. वहीं पश्चिमी देशों के साथ संबंधों को भी ध्यान रखना बहुत जरूरी होगा.

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