लड़कियों को पीरियड्स की जानकारी देंगे चाचा चौधरी, साबू और बिल्लू-पिंकी, डायमंड कॉमिक्स की अनूठी पहल

हमारे समय का ऐसा कौन है जिसके कॉमिक्स के चक्कर में अपने माता-पिता मार या डॉंट ना खाई हो. आज के बच्चों के हीरो भले ही सुपरमैन, स्पाइडर मैन, हल्क, कैप्टन अमेरिका, थायनोस, डॉक्टर स्ट्रेंज आदि हों, लेकिन हमारे ज़माने में तो हमारे हीरो चाचा-चौधरी, राजन-इकबाल, कमांडो ध्रुव, नागराज, बॉंकेलाल आदि हुआ करते थे. आज भी अगर किसी बुक स्टोर या किसी के घर पर चाचा-चौधरी या बिल्लू नजर आ जाएं तो होंठों पर मुस्कान और चेहरे पर चमक खुद-ब-खुद फैल जाती है.

याद है ना- ‘चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है’. गांव-कस्बों के लड़कों को कंप्यूटर शब्द से पहली बार रू-ब-रू चाचा चौधरी ने ही कराया था. और आदमकद का मोटे दिमाग वाला साबू- ‘जब साबू को गुस्सा आता है तो ज्वालामुखी फट पड़ता है’.

हमने चाचा चौधरी को अपने कुत्ते रॉकेट और साबू के साथ बड़े से बड़े आपराधिक मामले सुलझाते देखा था, हालांकि चाची के सामने हर शादीशुदा मर्द की तरह चाचा चौधरी भी बेबस नजर आते थे. चाची के बेलन के आगे साबू की भी घिग्घी बंधती हमने देखी है.

डायमंड कॉमिक्स की एक और पहल मुझे याद है- रेडियो पर शायद हर रविवार कॉमिक की कहानियों का प्रसारण होना. इसका जिंगल बहुत ही प्यारा था- “चुन्नू पढ़ता डायमंड कॉमिक, मुन्नी पढ़ती डायमंड कॉमिक, बड़ी मजेदार ये डायमंड कॉमिक”.

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हमारी पीढ़ी के अधिकांश लोग यही मानते हैं कि कॉमिक्स की दुनिया खत्म हो गई है. अब लिखे शब्दों से ही आंखों के सामने दृश्य सजीव करने देने वाली कॉमिक नहीं छपती हैं. लेकिन ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है. कॉमिक की दुनिया आज भी गुलजार है. आज भी ताऊजी का जादूई डंडा धूमता है और साबू पहले की तरह चाचा और चाची को अपने कंधों पर बैठाकर सैर के लिए निकलता है. हां, कॉमिक्स के इस सफर में एक जो बड़ी और मजेदार बात यह हुई है कि अब कॉमिक मनोजरंजन के साथ-साथ सामाजिक, स्वास्थ्य और ज्ञान के मुद्दे भी उठाने लगी हैं. इसका बड़ा ही प्यारा उदाहरण है ‘चाचा चौधरी और मासिक धर्म की शिक्षा’.

यूं तो हर वर्ष देशभर में बहुत-सी कॉमिक्स और बाल-पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं लेकिन मनोरंजन के साथ-साथ समाज को एक नई दिशा देनेवाली, पाठकों के मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ने वाली कॉमिक्स या पत्रिकाएं कम ही प्रकाशित होती हैं. ऐसे में पहली बार डायमंड पॉकेट बुक्स और लेखिका रिंकल शर्मा ने एक अनूठा प्रयास किया है अपनी कॉमिक्स, ‘चाचा चौधरी और मासिक धर्म की शिक्षा’ से, जो न सिर्फ मनोरंजन से भरपूर है बल्कि महिलाओं से जुड़े मासिक धर्म जैसे संवेदनशील विषय पर समाज को शिक्षित भी करती है. लेखिका रिंकल शर्मा और डायमंड पॉकेट बुक्स के प्रकाशक मनीष वर्मा का ये प्रयास सामाजिक विकास के प्रति उनकी जिम्मेदारी के साथ रचनात्मक तरीके से संवेदनशील विषय पर समाज को जागरूक करना, एक सराहनीय कदम है.

इस कॉमिक में रिंकल शर्मा ने चाचा चौधरी, साबू, बिल्लू और पिंकी जैसे प्रसिद्ध किरदारों को एक अलग ही रूप में प्रस्तुत किया है. इस कॉमिक में ये सभी किरदार हँसी-ठिठोली के साथ-साथ मासिक धर्म पर समाज को शिक्षित एवं महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ समाज में मासिक धर्म से जुड़ी रूढ़िवादी विचारधारा को समाप्त करने की भी कोशिश करता है.

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जब कभी भी हम लोग पहली बार किसी दौर से गुजरते हैं तो हमारे मन-मस्तिष्क में एक हलचल, एक उधेड़बुन होती है. पहली बार मासिक धर्म आने के दौरान लड़कियों की मन: स्थिति भी कुछ ऐसी ही रहती है. उनके मन-मस्तिष्क में हजारों सवाल उठते हैं जिन्हें वो खुल कर बोल भी नहीं सकतीं, सहमी रहती हैं. ‘चाचा चौधरी और मासिक धर्म की शिक्षा’ एक सम्पूर्ण पीरियड गाइड है जिसमें लेखिका ने चाचा चौधरी, साबू, चाची, डॉ. पूजा, पिंकी और बिल्लू जैसे किरदारों का प्रयोग करके बालमन में उपजने वाले ज्यादातर प्रश्नों का उत्तर बहुत ही सरल एवं हलके-फुल्के अंदाज़ में दिया गया है.

पहले समाज में, मासिक धर्म जैसे विषय पर जिस तरह से विचार-विमर्श होना चाहिए था, वो तो दूर, इस विषय पर बोलने पर भी कड़ी पाबंदी थी. शिक्षा संस्थानों में भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी जिससे बच्चों को मासिक चक्र के बारे में सही शिक्षा मिल सके. लेकिन आज समाज में मासिक धर्म जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी खुल कर बातचीत होने लगी है. घर-परिवार और स्कूलों में भी बच्चों को इन मुद्दों के बारे में खुलकर बताया जाता है.

इस कॉमिक्स में विमेंस डे (महिला दिवस) पर स्कूल में आयोजित एक सेमीनार की पृष्ठभूमि के लेकर, एक मज़ेदार कहानी और चाचा चौधरी, साबू, पिंकी इत्यादि के माध्यम से मासिक धर्म से जुड़े हर पहलू को बड़ी ही सरल एवं सजह भाषा में समझाया है. बहुत ही रोचक तरीके से कॉमिक को अलग-अलग चैप्टर जैसे:- किशोरावस्था और पीरियड्स, मासिक चक्र एक शारीरिक प्रक्रिया, मासिक चक्र की गणना, पीरियड्स और स्वच्छता तथा पीरियड्स में आहार और व्यायाम में विभाजित किया गया है. कॉमिक्स में संवेदनशील विषय पर जागरूक करने के साथ चाचा चौधरी के मज़ाकिया अंदाज और कम्प्यूटर से भी तेज़ चलने वाला उनका दिमाग, साबू की ताकत, चाची के साथ चाचा चौधरी की खट्टी-मीठी नोंक-झोंक और पिंकी के शरारती मिजाज़ द्वारा मनोरंजन का मिश्रण, कॉमिक को पाठकों के लिए रोचक बनाये रखता है.

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कॉमिक में लड़के और लड़कियों में किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों, पीरियड्स या मासिकधर्म क्या होता है, मासिक चक्र में किस प्रकार शरीर एक प्रक्रिया से गुजरता है. मासिक चक्र के दिनों की गणना किस तरह की जाती है, मासिक धर्म में साफ-सफाई का किस तरह ध्यान रखना चाहिए, पीरियड्स में सूती कपड़ा, सेनेटरी पैड, मेन्स्त्रुअल कप, टेमपोन इत्यादि के इस्तेमाल के तरीकों, उनकी सफाई और उनके निपटान, मासिक धर्म के दौरान किस तरह का पौष्टिक आहार लेना चाहिए, कौन-कौन से व्यायाम करने चाहिए जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है इत्यादि के बारे में विस्तार के साथ बहुत ही अच्छे तरीके से बताया गया है, जिससे कि पाठक मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षित भी हो सके.

मासिक धर्म से जुड़े मिथकों पर प्रहार
पुराने ज़माने में इस दौरान महिलाओं को अपवित्र समझा जाता था. कहीं-कहीं तो आज भी मासिक धर्म को स्त्री की पवित्रता और अपवित्रता से भी जोड़ा जाता है. इस दौरान महिलाओं को कई रूढ़िवादी मान्यताओं से भी गुजरना पड़ता है, जैसे- वे रसोई घर में नहीं जा सकतीं, पूजा घर में प्रवेश नहीं कर सकतीं इत्यादी.

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रिंकल शर्मा ने कॉमिक के आखिरी चैप्टर ‘मासिक चक्र से जुड़े भ्रम एवं सामान्य जानकारी’ में पिंकी और उसकी मां तथा दादी के किरदारों द्वारा बड़े ही सरल अंदाज़ में इन सभी भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया है.

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कॉमिक ‘चाचा चौधरी और मासिक धर्म की शिक्षा’ को हिंदी और अंग्रेजी के अलावा लगभग 14 प्रादेशिक भाषाओं में अनुवादित किया है. इस कॉमिक के निर्माण में प्रकाशक मनीष वर्मा और लेखिका रिंकल शर्मा के अलावा स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. पूजा दीवान, डॉ. पूजा सिंह, तकनिकी सलाहकार डॉ. रविन्द्र बोहरा, मार्गदर्शक डॉ. युगल जोशी और समन्वयक सृष्टि धवन का योगदान सराहनीय रहा है. आज के समय में यह कॉमिक पाठक वर्ग से लड़कियों के बुनियादी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने, महिलाओं के आत्म-सम्मान के बनाये रखने और रुढ़िवादी परम्पराओं को त्याग करने का आग्रह करती है.

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