कवि सम्मेलनों के लोकप्रिय कवि और सिन्दूरी गीतों के बादशाह रामस्वरूप ‘सिंदूर’ वैसे तो कानपुर से थे, लेकिन साल 1998 में प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रहने लगे और वहीं से उन्होंने ‘अंतर’ नाम की पत्रिका के प्रकाशन का काम किया. गौरतलब है, कि उनके तीन काव्य-संग्रह- ‘हंसते लोचन रोते प्राण’, ‘आत्म रति तेरे लिए’ और ‘शब्द के संचरण’ प्रकाशित हुए हैं.

रचनाधर्मिता की धारा की गति बनाए रखने के लिए रामस्वरूप ‘सिन्दूर’ ने गीतांतर पत्रिका का अनवरत प्रकाशन किया और उनकी सोच को गति देने के लिए उनके पुत्र ‘अनिल सिन्दूर’ ने भी ‘गीतांतर’ की यात्रा को उसी तरह से जारी रखा. इतने बरस बीत जाने के बाद भी ‘सिन्दूर’ के काव्य में एक अलग तरह की जीवंतता है, जो अपनी ओर खींच कर बिठा लेती है. साहित्य की दुनिया में वे जिस तरह आगे बढ़े और रोशनी की तरह फैल गए, ऐसे कवि कम ही होते हैं. उनके काव्य में एख खास तरह का आत्मविश्वास, गहरा चिंतन और संवेदनाओं का ज्वार है, जो उन्हें पढ़ते हुए गहराई तक महसूस होता है.

रामस्वरूप ‘सिन्दूर’ को उत्तर प्रदेश के हिंदी संस्थान द्वारा ‘साहित्य भूषण सम्मान’ से नवाज़ा गया है, साथ ही उन्हें ‘रस वल्लरी सम्मान’, भारतीय साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘सारस्वत सम्मान’, ‘सागरिका विशेष सम्मान’, ‘चेतना गौरव सर्वोच्च सम्मान’, ‘प्रथम मणींद्र स्मृति सम्मान’, कानपुर के ‘नटराज सम्मान’ और लखनऊ में ‘राष्ट्रीय काव्य सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया है. 26 जनवरी 2013 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली और दुनिया को अलविदा कह दिया. वे स्वयं को साहित्य का सेवक मानते थे और जिस तरह उन्होंने अपने इस काम को अंजाम दिया वह अविस्मरणीय है.

आइए पढ़ते हैं रामस्वरूप ‘सिन्दूर’ के सुप्रसिद्ध गीत-संग्रह ‘आत्म-रति तेरे लिए’ से ग्यारह चुनिंदा गीत. इस गीत-संग्रह को साहित्य सदन ने साल 1986 में प्रकाशित किया था-
1)
तुम आए तो
तुम आए तो सावन आया, गए उठा तूफ़ान!
जल में तैरे रेगिस्तान!

कुछ कहना हो, कुछ कह जाऊं,
दिन-दिन-भर घर में रह जाऊं,
ताजमहल जैसा लगता है कलई पुता मकान!
जल में तैरे रेगिस्तान!

दर्पण देखूं, देख न पाऊं,
अर्थहीन गीतों को गाऊं,
सूरज डूबे ही पड़ जाऊं, सर से चादर तान!
जल में तैरे रेगिस्तान!

सोते में चौकूं, डर जाऊं,
सांस चले, लेकिन मर जाऊं,
सिरहाने रखने को खोजूं, आधी रात कृपान!
जल में तैरे रेगिस्तान!

मुश्किल से हो कहीं सबेरा,
चैन तनिक पाए जी मेरा,
जैसे-जैसे धूप चढ़े, होता जाऊं नादान!
जल में तैरे रेगिस्तान!

2)
सब कुछ भूला
सब कूछ भूला, किन्तु न भूले वे लोचन अभिराम!
तुम्हारे लोचन ललिल-ललाम!

चितवन में सपनों की छाया,
मृग-मरीचिकाओं की माया,
इन्द्रधनुष-धारे पलकों में छिपे रहें घनश्याम!
तुम्हारे लोचन ललिल-ललाम!

बात न अधरों तक आए,
दृष्टि सहज में ही कह जाए,
वे दृग, संकेतों से ले-लें कैसे-कैसे काम!
तुम्हारे लोचन ललिल-ललाम!

कब की उठी मधुर मधुशाला,
पर न अभी तक उतरी हाला,
कभी-कभी मैं हस्ताक्षर में, लिख जाऊं खैयाम!
तुम्हारे लोचन ललिल-ललाम!

3)
चाहूं या कि न चाहूं
चाहूं या न चाहूं बहना ही होगा,
स्वर्ण-तरी जब उतर गई मझधार में!

एक खीझ ने पतवारों को फेका फेनिल नीर में,
आकृति-भर का भेद रह गया नैया और शरीर में;
गति पूरे यौवन पर, लेकिन यति का होता बोध है,
कैसी मेरी प्रगति, कि जिसमें ऐसा रोध-विरोध है;

मेरा क्या अपराध विधाता जो तूने,
मुझे चुन दिया लहराती दीवार में!

मेरे औ’ मेरे भविष्य के बीच सूर्य का तेज़ है,
क्या जाने आगे शर-शैया या सुमनों की सेज है;
लहरों ने दृग बांध दिए हैं चकाचौंध के चिर से,
सारी संसृति घिरी हुई है दर्पण की प्राचीर से;

दृष्टि चतुर्दिक देखे कुछ ऐसे, जैसे,
अभी-अभी जनमी हो इस संसार में!

मैं गत-आगत भूल अनागत के रंगों में लीन हूं,
मैं एक राजसी दिवास्वप्न के रथ पर बैठा हूँ;
मनचाहा यह सपना टूटे, या-तो फिर साकार हो,
जो कुछ होता है, लेकिन ज्वारों का अवतार हो;

छूटे सब अपने, सपने पर जीना है,
जन्म कैद जो बहते कारागार में!

4)
याद रहे रंगों का मेला
याद रहे रंगों का मेला, रंगों की रानी!
करो कुछ ऐसी नादानी!

नयनों में अरुणाभा तैरे
अधर हुए रसभीने,
कोने-कोने सोम कलश हैं
चलो-चलें हम पीने,
ए, वे क्षण हैं, जिनको तरसें बड़े-बड़े ज्ञानी!
करो कुछ ऐसी नादानी!

पार करें अंजन के रेखा
चितवन बाज़ न आए,
तप्त शिराओं पर पड़ते हैं
रति-अनंग के साए,
गर्म अबीरी सांसों को कर दो पानी-पानी!
करो कुछ ऐसी नादानी!

ठुमुक चलो तुम ऐसे, जैसे
जल-तरंग लहराए,
उत्तेजना के साथ पिचकारी खींचो
तन विवस्त्र हो जाए,
अनजाने में करो शरारत जनि-पहचानी!
करो कुछ ऐसी नादानी!

इंद्र धनुष तोड़ा बसन्त ने
सिन्दूरी आंगन में,
रोली को गुलाल ले भागा
यौवन के मधुबन में,
लजवन्ती कामना न ढक पाए आंचल धानी!
करो कुछ ऐसी नादानी!

5)
भर आया क्यों नीर
भर आया क्यों नीर नयन में!

मैं समीप बैठा हूं तेरे,
तुझको मेरी छाया घेरे,

मुक्त, मृदुल-शीतल समीर ने
पीर कौन ढाली तन-मन में!
भर आया क्यों नीर नयन में!

तुम कुछ घूर रहे थे,
किसने तेरी दृष्टि गही थी,

अब न ठीक से मुख भी अपना
दिखता होगा उस दर्पन में!
भर आया क्यों नीर नयन में!

आज रात क्या नींद न आई,
इस वेला में तू अलसाई,

चल, श्रृंगार करूं मैं तेरा
हरसिंगार झरते उपवन में!
भर आया क्यों नीर नयन में!

6)
महके फूल
महके फूल रातरानी के!

आज पास होती तू मेरे
भर देता अंजलि सुवास से,
मुखरित कर देती सूनापन
तू अलबेले मौन-हास से,

इन आंखों में रस लहराता
इस पानी के लिए कोई बादल नहीं होंगे!
महके फूल रातरानी के!

सासों को सुगन्धि से पहले
बेचैनी ने घेर लिया है,
हाथों को सुमनों से पहले
इन पलकों ने काम दिया है,

कितने भोले-भाले पल ए
करुणा के घर मेहमानी के!
महके फूल रातरानी के!

थोड़ी सी आहट मिलते ही
एक होश-सा आ जाता है,
देख न ले यों रोता कोई
भय प्राणों पर छा जाता है,

दुनिया की नज़रों में मेरे
बीत गए दिन नादानी के!
महके फूल रातरानी के!

7)
मधुर दिन बीते
मधुर दिन बीते और न बीते!
वर्तमान में नहीं, इन्हीं दोनों में हम जीते!

यादों के सरगम से ऊबे,
सपनों के आसव में डूबे,
आंखें रस पीती हैं, लेकिन होंठ अश्रु पीते!
मधुर दिन बीते और न बीते!
वर्तमान में नहीं, इन्हीं दोनों में हम जीते!

आतप ने झुठलाई काया,
सर पर बादल-भर की छाया,
सूखी पौद हरी कर देंगें, क्या कपड़े तीते!
मधुर दिन बीते और न बीते!
वर्तमान में नहीं, इन्हीं दोनों में हम जीते!

हम पनघट की राहें भूले,
मृग मरीचिकाओं में फूले,
कन्धों के घट पड़े हुए हैं, रीते के रीते!
मधुर दिन बीते और न बीते!
वर्तमान में नहीं, इन्हीं दोनों में हम जीते!

8)
लगता है कुछ दिनों से
लगता है कुछ दिनों से मुझे मर गया हूं मैं!
अपने वुजूद से तो नहीं डर गया हूं मैं!

आता रहा जहां में आम शख्स की तरह,
जब भी गया हूं, हो-के पयम्बर गया हूं मैं!

आंखों में रह गई न रौशनी, न तीरगी,
अहसास की सरहद को पार कर गया हूं मैं!

जिन रास्तों पे जा-के लौटना मुहाल था,
उन रास्तों पे दोस्तो! अक्सर गया हूं मैं!

रहना तो अकेला था, मगर जोशे जुनू में,
‘सिन्दूर’ मांग में किसी की भर गया हूं मैं!

9)
बिछुड़ के तुमसे
बिछुड़ के तुमसे एक उम्र मैं उदास रहा,
ख़ुदी से दूर, बेखुदी के आसपास रहा!

न ग़मगुसार रहा जो, न गमगियास रहा,
जुनेने-शौक के धोखे में बदहवास रहा!

उसे कहूं तो किस तरह से कहूं बेगाना,
न दूर-दूर रहा वो, न पास-पास रहा!

तमाम रंग भर दिए जहान में जिसने,
वो रंगरेज, यहां जोगिया लिबास रहा!

न मैंने देखे कभी तख्तो-ताज़ के सपने,
तमाम उम्र कोहेनूर मेरे पास रहा!

किसे पता है कि ‘सिन्दूर’ की निगाहों में,
न कोई आम रहा, औ’ न कोई ख़ास रहा!

10)
वो बेवफ़ा ही सही
वो बेवफ़ा ही सही, ग़मगुसार भी तो है!
क़रार भी उसे, बेक़रार भी तो है!

मुझे सता के उसे चैन न आया होगा,
वो दिल फ़रेब तो है, दिलफ़िगार भी तो है!

किसी ने बादए उल्फ़त से, तो कर ली तौबा,
नशे को मात करे, वो ख़ुमार भी तो है!

मैं तश्नालब हूं इस शहर में हकीक़त है मगर,
य’ कोहसार, कहीं आबशार भी तो है!

जहां में रह गया न उसका कोई नामो-निशां,
कि उसकी याद ही अब, यादगार भी तो है!

उसे कभी तो य’ ‘सिन्दूर’ याद आएगा,
वो बेमेहर है मगर, जांनिसार भी तो है!

11)
ज़िन्दगी मांगी हुई सौगात है
ज़िन्दगी मांगी हुई सौगात है!
आदमी डूबा हुआ जलजात है!

धूप, आंसू, स्वेद, शबनम-चांदनी,
ज़िन्दगी बरसात ही बरसात है!

मंजिलें भी पंथ से कहते मिलीं,
जीत ही सबसे करारी मात है!

हाय रे! उन्मुक्त उर की बेबसी,
किस क़दर ख़ामोश झंझावात है!

लाज ने वाचाल नैनों से कहा,
‘मौन से प्यारी लगे वह बात है!

मौन चुम्बन में मुखर हो कह गया,
‘स्वप्न को प्यारी लगे वह रात है!’

कानपुर का हाल मुझसे पूछिए,
आज भी ‘सिन्दूर’ ही विख्यात है!

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