3 अप्रैल 1948 को भोपाल में जन्मे सुपरिचित कथाकार पद्मश्री ‘मंज़ूर एहतेशाम’ को अपने कालजयी उपन्यास ‘सूखा बरगद’ के लिए श्रीकांत वर्मा स्मृति सम्मान और भारतीय भाषा परिषद द्वारा सम्मानित किया गया. मंज़ूर का यह महत्वपूर्ण उपन्यास वर्तमान भारतीय मुस्लिम समाज के अंतर्विरोधों की गंभीर, प्रमाणिक और मूल्यवान पड़ताल का नतीजा है और यही वजह है कि इस उपन्यास को हिंदी की कालजयी रचनाओं में गिना जाता है. समाजिक विकास के जिन अत्यंत संवेदनशील गतिरोधों पर कलम उठाने और उन्हें छूने-भर का साहस बहुत कम लोग कर पाते हैं, उन्हें इस उपन्यास में न सिर्फ छुआ गया है, बल्कि इंसान की ज़रूरतों, आशा-आकांक्षाओं और अस्तित्व के संदर्भ में उनकी गहरी छानबीन की गई है.

धर्म, जातीयता, क्षेत्रीयता, भाषा और संप्रदायिकता के जो ज़रूरी सवाल आज़ादी के बाद हमारे समाज में यथार्थ के विभिन्न चेहरों में उभरते हैं उनकी असहनीय आंच ‘सूखा बरगद’ अपन्यास में मौजूद है. जो सवाल इस उपन्यास में मौजूद हैं, वही सारे सवाल आज भी हमारे आसपास एक ऐसे बरगद की झूलती जड़ें बनकर फैले हुए हैं, जिसके नीचे किसी भी कौम की तरक्की और खुशहाली संदेह के घेरे में आ जाती है. लेकिन जो सवाल सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह जानना है कि इस त्रासदी के पीछे किसका हाथ है?

आइए पढ़ते हैं सूखा बरगद उपन्यास के अंश, जिसका प्रकाशन राजकमल पेपरबैक्स ने किया है.

पुस्तक अंश: सूखा बांस
कितनी अजीब-सी बात है कि अपनी ज़िंदगी के बारे में जब हम सोचने बैठते हैं तो चीज़ें बिना किसी आपसी सिलसिले के, टुकड़े-टुकड़े दिमाग में आती हैं. कुछ घटनाएं, जो अपने होने के समय हमें बेहद साधारण और बेमतलब लगी थीं, धीरे-धीरे नए मतलब, नए आयाम ग्रहण कर लेती हैं, और बहुत कुछ, जिसका घटना बहुत महत्वपूर्ण जान पड़ा था, बेनामों-निशान हो जाता है. कुछ बातें जिनको घटते क्षण-भर लगा था, हमारी याददाश्त के दिनों और वर्षों पर फैल जाती हैं, और बेगिनती दिन और साल आप-ही-आप सिमटकर, इसी याददाश्त में हाशिए पर ही कहीं भूल में तब्दील हो जाते हैं, खोजाते हैं. क्या बीते हुए को याद करते हुए हम सौ फीसदी निरपेक्ष और ईमानदार होते हैं? या ऐसा होना चाहें, तो भी हो सकते हैं? मुझे ऐसा संभव नहीं लगता. याददाश्त मुझे एक ऐसी मां की तरह लगती है, जिसकी बहुत-सी औलादें हों, कुछ जो पैदा ही मुर्दा हों, कुछ जो पैदाइश के थोड़े समय बाद खत्म हो जाएं और कुछ ऐसी जो जीवित रहें. मां लाख दावे और कोशिश के बाद भी सारी औलादों को एक जितना प्यार नहीं कर सकती. जिनको वह प्यार करती या करना चाहती है, उनके लिए सैकड़ों बहाने भी तलाश कर लेती है. जिनको नहीं चाहती, वह अगर उस पर अपने प्राण भी निछावर कर दें, तो भी उन ‘लाड़लों’ की बराबरी नहीं कर सकते.

मां का उदाहरण शायद बहुत दूर तक मेरी बात और मतलब का साथ न दे सके. मैं कहना शायद इतना चाहती हूं कि याददाश्त में हम अपनी सुविधा और पसंद के हिसाब से रद्दोबदल कर लेते हैं या ऐसा शायद हमारे बिना जाने ही होता रहता है. जिस घटना या बात को याद करके हमें सुख या मिठास का अनुभव होता है वह कल्पना के सहारे स्मृति में दिन-ब-दिन अपनी असलियत से कहीं ज्यादा राहत देनेवाली, कहीं ज्यादा मीठी होती जाती है. हम उसमें जहां-जहां चाहें अपने मनचाहे रंगों को भरते रहते हैं, खूबसूरत बनाते रहते हैं. और शायद बिलकुल यही हमारी याद से जुड़े तल्ख मामलों के साथ होता है. जितना हमारा मन करता है हम उन्हें मैग्निफाइ और हकीकत से बड़ा, भोंडा और भद्दा कर लेते हैं. प्रिय हो या अप्रिय- याददाश्त हमारी, बहरहाल, सबकुछ में से बहुत थोड़ा-सा चुनती है और फिर उसी थोड़े के सहारे हमारे एक काल्पनिक अतीत को रचती है. शेष सबकुछ उसके लिए कतई अनावश्यक है जो छंट या एडिट हो जाता है.

याद आता है…

‘…तुम्हारे इतने करीब होने, तुमसे इतना कुछ कहने-सुनने, तुम्हारे साथ इतना लंबा वक्त गुजारने के बाद भी क्या हम दोनों में इतनी हिम्मत है कि एक-दूसरे का हाथ पकड़कर दुनिया के सामने खड़े हो पाएं? वही बातें जो किताबों में पढ़ने पर भली और बहस करने के लिए दिलचस्प हैं, जिनके सपने दिखाकर चुनाव लड़े जाते हैं और कुछ लोग जिन्हें चाबुक की तरह इस्तेमाल करके अपने कैरियर्स के घोड़े हांकने में लगे हैं, एक बार जरा इसी तरह खड़-खड़े, जैसे इस समय मैं और तुम-खुद अपनी जबान पर तौलकर देखें- इट् आल् सीम्स सो एब्सर्ड!’ …मैं.

याद नहीं आता…

अवामी लीग… मुजीबुर्रहमान… यहया खान… पीपल्स पार्टी… भुट्टो… वली खान. नया-नया बना बांग्लादेश. या ‘इंडिकेट’, …कामराज, निजलिंगप्पा-चरखा कातती औरत. देश में हुई एक और जंग जो हमारी जिंदगियों को फिर से एक पुराने तरह के नए इम्तहान में डाल गई थी… और जिसका असर, खासकर देश के मुसलमानों के सोचने-समझने और जीवन-संबंधित रवैयों पर बहुत दूर और देर तक पड़ना था. और मुल्क में हुआ पांचवा आम और पहला मध्यावधिक चुनाव, जिसके नतीजे देश की राजनीति में बहुत बड़े इंकिलाब आनेवाले थे. नए नेताओं को मंच पर आना था और पुराने बड़े-बड़े नामों को गुमनामी के गार में खो जाना था. और जब पहली बार देश की हकूमत चुनने का मुझे इख्तियार मिला था, …और मैंने उसे इस्तेमाल करते हुए अपने जीवन में पहली बार वोट दिया था.

याद आता है-

‘…क्यों? …इसमें एब्सर्ड क्या है? हम जो करेंगे अपनी सोच-समझ और फैसले से करेंगे. सबकी परवाह कौन करता है.’ -विजय.

शाम का समय. हम लोग बड़े तालाब के किनारे उतर रहे हैं. डामर की पगडंडी-नुमा पतली सड़क, इर्द-गिर्द फैला पहाड़ी चट्टानों का ऊबड़-खाबल सिलसिला और उस पर बिखरे झाड़-झंकाड़, हमारे सिर के ऊपर से उड़कर गया परिंदों का चीखता-चिल्लाता झुंड बहुत नीचे कहीं ताल की सतह पर डगमगाती वह अकेली कश्ती और सूरज की ओर लपकते भूर-भूरे बादलों के दल. सबकुछ- सारे रंग, सारी खुशबुए, सारे आकार याददाश्त ने अपनी सहूलियत और पसंद के हिसाब से कैद कर रखे हैं. इस समय के आगे या पीछे, कुछ भी, मैं जब याद करना चाहती हूं तो इस शाम की याद के हवाले ही याद आती है. जैसे किसी नई और अजनबी जगह में अपनी दिशा बनाए रखने के लिए लोक कुछ निशानियां तय कर लेते हैं- कोई एक सितारा, कोई पहाड़ की चोटी, कोई-सा भी एक लैंडमार्क. जब-जब रास्ता गड़बड़ाता लगता है, यह लैंडमार्क उन्हें अपनी जगह मालूम करने में फिर से रास्ता खोजने में भटकने से बचने में सहायक होता है. एक तरह से, अगर कहा जाए तो मेरे दिमाग का जीता-जागता कंपास, जो मुझे अपनी ज़िंदगी का बहुत कुछ खोजने में मदद करता है, इस शाम और इसकी याद में निहित है. इस शाम की याद से जुड़ी हैं इसके पहले और बाद फैली निरंतर शामों की तफसीलें. दिन, महीने, लोग और घटनाएं जीवित होने लगते हैं. मैं याद कर सकती हूं- उन दिनों अब्बू की सेहत. सुहेल की दिनचर्या. अम्मी का मुसलसल नमाज़ और वजीफा पढ़ता हुलिया. रेडियो स्टेशन पर नए-नए आए अली हुसैन साहब और हमारे घर के सामने की सड़क, जिसको चौड़ा करने का काम पूरे जोर-शोर से चल रहा था और जिसके नतीजे में कई घने और सायादार दरख्तों को जिबह कर दिया गया था. सारा बीता समय एक जीते-जागते समुद्र की तरह, ठाठें मारता, आंखों के सामने उजागर हो जाता है जिसे मैं इस शामनुमा कश्ती के आसपास फैला महसूस कर सकती हूं.

“वैसे भी,” कदम उठाते हुए विजय कहता है- “आजकल धर्म-वर्म के चक्कर में इतना पड़ता कौन है.”

सर्दियां खत्म हो चुकी हैं, गर्मियों की शुरुआत है. रह-रहकर धूल में सनी हवा के झोंके चल उठते हैं.

“सब ही पड़ते हैं,” मैं उसके कहे को सवाल मानकर जवाब देती हूं- “तुम्हारे खानदानवाले भी और मेरे खानदानवाले भी.”

याद आ रहा है, विजय इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में है और महीने डेढ़ महीने बाद उसकी परीक्षा होने को है. सुहेल ने अभी तक अपने तीसरे साल के भी पूरे सब्जेक्ट्स पास नहीं किए हैं. उसका कॉलेज जाना कभी-कभार ही हो गया है और दिनचर्या में बहुत बड़ा फर्क आ गया है. इधर कई दिनों से अब्बू की तबीयत लगातार खराब चल रही है और इलाज-मालजे के बाद भी कोई खास फायदा नहीं. विजय और सुहेल के आपसी संबंधों में एक खास तरह का ठंडापन और फासला पैदा हो चुका है. मैं रेडियो स्टेशन पर अपनी ड्यूटी पाबंदी से बजाती रही हूं और विजय भी मुझसे मिले अक्सर यहीं आ जाता है. हम दोनों जब-तब साथ समय बिताते रहे हैं और शायद इसका पता या अंदाजा सुहेल को भी हो गया है. दूसरा कोई बहरहाल, इस तफसील को नहीं जानता. पिछले बारह-पंद्रह महीनों में कुछ अविश्वसनीय-से परिवर्तन हुए हैं.

“उनसे क्या फर्क पड़ता है?” विजय सवाल करता है.

“तो फिर किनसे पड़ता है?”

खामोशी में सूखे पत्तों की सड़क पर खड़कने की आवाज.

“यह क्या बात हुई!” विजय मज़ाक उड़ाने के अंदाज़ में कहता है- “तुममें और तुम्हारी उम्र की एक हिंदू लड़की में आज क्या फर्क है? जिस तरह तुम्हें पाला-पोसा गया है, कुछ उसी तरह से एक हिंदू लड़की की परवरिश की जाती है. देखकर कोई बता सकता है कि तुम हिंदू हो या मुसलमान?”

मैं रुक जाती हूं.

“फर्क है,” मैं कहकर आगे बढ़ती हूं- “और बहुत बड़ा फर्क है!”

विजय की खामोशी, एक सवाल की तरह.

“जब मेरे,” मैं चलते-चलते बोल रही हूं- “अचानक कोई चोट लगती है तो खुद-ब-खुद ही मुंह से ‘या अल्लाह’ निकल जाता है. यही फर्क है, बस.”

“तुम्हारा मतलब है,” विजय मेरी बात को हल्के अंदाज में लेते हुए कहता है- “कि अगर तुम्हारे मुंह से ‘हे राम’ निकले तो तुम्हारे अंदर कुछ बदल जाएगा.”

“सच्चाई यही है कि मेरे मुंह से ‘हे राम’ निकलेगा ही नहीं. खुद मुझे भी लगता यही है, कि अगर निकल भी जाता तो मुझमें ऐसा कोई फर्क नहीं पड़ जाता, लेकिन मैं सोच ही सकती हूं. फैसला करने की हैसियत में मैं नहीं. और जाने, दुनिया की नजरों में शायद कुछ खास बदल ही जाता हो.”

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