पुस्तक समीक्षा: मंचों पर गज़ल कहने का चलन बढ़ता जा रहा है. नए-नए ग़ज़लकार सामने आ रहे हैं. सोशल मीडिया ने हर किसी को गज़लकार बना दिया है. गज़लकारों की बढ़ती भीड़ को लेकर अपने समय के मशहूर हास्य कवि अल्हड़ बीकानेरी ने बड़ा ही करारा तंज कसा था-

लफ़्ज तोड़े मरोड़े गज़ल हो गई
सर रदीफ़ों के फोड़े गज़ल हो गई

लीद करके अदीबों की महफिल में कल
हिनहिनाए जो घोड़े गज़ल हो गई

माइक की गांड पकड़ कर एक ने रैंक लगा दी
हाथ पब्लिक ने जोड़े गज़ल हो गई

पंख चींटी के निकले बनी शाइरा
आन लिपटे मकोड़े गज़ल हो गई।

अल्हड़ बीकानेरी ने ये कोई कविता या चुटकुला नहीं सुनाया, जिसे सुनकार लोग हँस पड़ें. यह व्यंग्य था. गज़ल को लेकर उनकी चिंता इस व्यंग्य की मार्फत सामने आई. हम जिन्हें एक कायदे का गज़लकार कहते हैं उनमें से बहुत-सो को इस हुनर के जानकारों ने गज़लकार मानने से ही इनकार कर दिया था.

गज़ल करने का एक तरीका होता है, उसके कुछ पैमाने होते हैं. गज़ल को एक तय मीटर में फिट किया जाता है. उसके कहने का तरीका भी ज़ुदा होता है. इसलिए गज़ल के मैदान में उतरने से पहले उसकी बाकायदा तालीम लेना बहुत जरूरी है. अगर आप गज़ल कहने और सुनने का शौक रखते हैं तो आपको भी इसकी तालीम लेना लाजमी है.

अब सवाल उठता है कि गज़ल की तालीम कैसे हासिल की जाए? किसे उस्ताद माना जाए? ऐसा कौन होगा जो हमें गज़ल की बाकायदा तालीम दे? रेख़्ता बुक्स ने इसका बड़ा ही अच्छा और सरल समाधान निकाला है. रेख़्ता बुक्स ने गज़ल को समझने और सीखने के लिए दो पुस्तकें- ‘बातें गज़ल की’ और ‘गज़ल की बात’ प्रकाशित की हैं. इन पुस्तकों में गज़ल विधा से जुड़ी हर बात को बड़े ही सलीके और विस्तार से समझाया गया है.

बातें गज़ल की
‘बातें गज़ल की’ पुस्तक के लेखक हैं आकाश अर्श और फरहत एहसास. इस पुस्तक के बारे में लेखक फरहत एहसास कहते हैं कि उर्दू गज़ल के बारे में बहुत-सी किताबें मौजूद हैं, मगर वो सब किसी और जमाने तथा कुछ और लोगों के लिए लिखी गई हैं. इन किताबों का सम्बोधन ऐसे लोगों से है जो उर्दू अच्छी तरह जानते हैं, बल्कि अरबी और फारसी भी जानते हैं. ऐसी किताबें आज सिर्फ संदर्भ पुस्तकों के तौर पर ही पढ़ी जा सकती हैं, गज़ल से आम लोगों की तरह परिचित होने के लिए नहीं.

हिंदी भाषा में नहीं है अपना कोई विराम चिह्न, केवल पूर्ण विराम को छोड़कर

फरहत एहसास लिखते हैं कि यह किताब उर्दू गज़ल के काव्यशास्त्र के अतीत को वर्तमान की भाषा में अनुवाद करने पर आधारित है. इस किताब को उन लोगों, खासतौर पर नौजवानों के लिए तैयार किया गया है जिन पर उर्दू गज़ल का जादू चल चुका है और वो गज़ल को जानना समझना चाहते हैं. या फिर गज़ल कहने का इरादा रखते हैं. ‘बातें गज़ल की’ पुस्तक में हम शेर और गज़ल के बारे में विस्तार से समझ सकते हैं.

गज़ल की संरचना के बारे में हम मीर तक़ी मीर की इस गज़ल से जानकारी हासिल कर सकते हैं-

हस्ती अपनी हबाब की सी है
ये नुमाइश सराब की सी है
नाजुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी एक गुलाब की सी है
बार बार उस के दर पे जाता हूं
हालत अब इज्तिराब की सी है
मैं जो बोला कहा कि ये आवाज
उसी खाना-खराब की सी है
आतिश-ए-गम में दिल भुना शायद
देर से बू कबाब की सी है
मीर उन नीम बाज आंखों में
सारी मस्ती शराब की सी है।

बह्र, काफ़िया और रदीफ़
गज़ल शेरों (अश्आर) का संग्रह होती है. इसे बह्र (छंद), काफ़िया और रदीफ़ की पैरामीटर में तैयार किया जाता है. शेर गज़ल की आधारभूत इकाई होती है. हर शेर का अपना अलग अस्तित्व होता है और कई शेर को मिलाकर गज़ल तैयार होती है.

मिस्राः गज़ल के हर शेर में दो पंक्तियां या मिस्रे होते हैं. पहले मिस्रे को पारंपरिक तौर मिस्रा-ए-ऊला या मिस्रा-ए-अव्वल कहा जाता है और दूसरे मिस्रे को मिस्रा-ए-सानी कहते हैं. इन्हें पहला और दूसरा मिस्रा भी कह सकते हैं.

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मत्लाः मत्ला गज़ल का पहला शेर होता है. मत्ला का अर्थ है उदय होना. ऊपर दी गई गज़ल का मत्ला ये है-
हस्ती अपनी हबाब की सी है
ये नुमाइश सराब की सी है

मत्ले को दोनों मिस्रों में काफ़िया और रदीफ़ का पालन किया जाता है. गज़ल में कई मत्ले भी हो सकते हैं. मत्ले के बाद शेर में सिर्फ मिस्रा-ए-सानी यानी दूसरे मिस्रे में काफ़िया और रदीफ़ का पालन किया जाता है.

काफ़ियाः काफ़िया गज़ल के हर शेर में इस्तेमाल होने वाले तुकांत शब्दों को कहते हैं.

मक़्ताः मक़्ता गज़ल का आखिरी शेर होता है. इसका अर्थ होता है खत्म करना. आमतौर पर शायर इस शेर में तख़ल्लुस का प्रयोग करते हैं.

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इस तरह आप जैसे-जैसे इस किताब के पन्ने पलटते जाएंगे, गज़ल में इस्तेमाल होने वाली हर चीज के बारे में विस्तार से पढ़ते जाएंगे. यहां काफ़िया के बारे में एक पूरा अध्याय है. सबसे अच्छी बात ये है कि गज़ल की तमाम बारीकियों से रू-ब-रू होते हुए आप जब पुस्तक में आगे बढ़ते हैं तो आप दुर्लभ शायरों की गज़लों से होकर गुजरने का मौका मिलेगा. लेखक ने इन शायरों की गज़लों के माध्यम से गज़ल की बारीकियों को भी समझाने का अच्छा प्रयास किया है.

पुस्तक में कुली कुतुब शाह, सय्यद मीरां मियां खां हाश्मी, सिराज औरंगाबादी, शाह मुबारक आबरू सहिता कई ऐसे शायरों की गज़लों से मुलाकात होगी जिन्हें आपने शायद ही कहीं पढ़ा और सुना होगा. यहां आपका राब्ता होगा दिल्ली के मशहूर शायर मीर गुलाम ‘हसन’ से. ‘हसन’ साहब का समय 1741 से 1826 तक का रहा है. उनकी एक गज़ल यहां दी गई है-

हम न निकहत हैं न गुल हैं जो महकते जावें
आग की तरह जिधर जावें दहकते जावें
ऐ खुशा-मस्त कि ताबूत के आगे जिस के
आब-पाशी के बदल मय को छिड़कते जावें
जो कोई आवे है नजदीक ही बैठे है तिरे
हम कहां तक तिरे पहलू से सरकते जावें
गैर को राह हो घर में तिरे सुब्हान-अल्लाह
और हम दूर से दर को तिरे तकते जावें
वक्त अब वो है कि इक एक हसन हो के ब-तंग
सब्र-ओ-ताब-ओ-खिरद-ओ-होश खिसकते जावें।

(निकहत- सुगंध, खुशा मस्त- भाग्यशाली शराबी, बतंग- व्यथित)

किताब में बताया गया है कि मीर गुलाम ‘हसन’ दिल्ली छोड़कर लखनऊ में जा बसे थे. वे एक अच्छे गज़ल शायर थे. उनकी गज़ल के बारे में कहा गया है कि गज़ल के मत्ले का जोर और लहजा बहुत खूब है और गर्म तबीअत का हामी है. तीसरे शेर के बारे में बताया गया है-
जो कोई आवे है नजदीक ही बैठे है तिरे
हम कहां तक तिरे पहलू से सरकते जावें

इस शेर में शायर माशूका से कह रहा है कि भले ही मुझे तुम्हारी सभा में बैठने का स्थान मिल गया था, लेकिन जो भी शख्स आता है, वो तुम्हारा चाहने वाला होता है और आ कर तुम्हारे पास बैठ जाता है. ऐसे में हम कहां तक तुम से दूर सरकते जाएं?

पुस्तक के आखिरी में गज़ल के अलावा शायरी की अन्य विधा मस्नवी, कसीदा, रेख्ती, रुबाई और मर्सिया के बारे में भी बताया गया है मगर सक्षिप्त में.

कुल मिलाकर ‘बातें गज़ल की’ उर्दू गज़ल के चाहने वालों के लिए यह किताब बड़ी मददगार साबित होगी. कहते हैं कि गज़ल को अगर माशूक माना जाए तो यह किताब आपको माशूक की गली बल्कि उसके मोहल्ले के भूगोल और इतिहास के बारे में बताएगी. फिर माशूक के चेहरे-जिस्म की संरचना से परिचित कराएगी. फिर उसके हुस्न की चर्चा करते हुए हुस्न से पैदा होने वाले रहस्यों से बाखबर करेगी.

पुस्तकः बातें गज़ल की
लेखक: आकाश अर्श और फरहत एहसास
प्रकाशक: रेख्ता प्रकाशन
कीमत: रु

टैग: पुस्तकें, हिंदी साहित्य, साहित्य

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