सुप्रसिद्ध हिंदी लेखक राजेंद्र यादव का नाम स्वातंत्र्योत्तर कथा साहित्यकारों में विशेष उल्लेखनीय है. वे मुख्यत: सामाजिक चेतना के कथाकार हैं. उन्होंने साहित्य सृजन को स्वधर्म रूप में स्वीकार किया और अर्थ व राजनीति आदि को दृष्टि में रखकर कभी समझौता नहीं किया. वे पूरी तरह से साहित्य के प्रति प्रतिबद्ध बने रहे और बाहरी दबावों से मुक्त होकर अपने लेखन को स्तरीय एवं प्रमाणिक बनाए रखने का उन्होंने हमेशा प्रयत्न किया. हमेशा उनका झुकाव यथार्थ और मानव मूल्यों की खोज के प्रति रहा, जो कि उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए महसूस किया जा सकता है.

राजेंद्र यादव का उपन्यास साहित्य, हिंदी साहित्य जगत में उल्लेखनीय स्थान रखता है. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय जीवन पर आधारित उनके उपन्यासों में प्रगतिवादी चिंतन धारा अपनाते हुअ मध्यवर्ग का जीवन चित्रित किया गया है. सिर्फ ‘सारा आकाश’ ही नहीं उन्होंने अपने अधिकतर उपन्यासों के माध्यम से मध्यवर्ग को उसकी शक्ति एवं सीमा के साथ प्रस्तुत किया, साथ ही मध्यम वर्गीय परिवार और व्यक्ति स्तर पर होने वाले बिखराव और टूटन को भी प्रमाणित रूप से ज़ाहिर किया. समकालीन जीवन की वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं का चित्रण उनकी कहानियों की विशेषता रही है. ऐसा ही एक उपन्यास है ‘सारा आकाश’जिसके कई संस्करण प्रकाशित हुए और साल 2008 में ‘राधाकृष्ण पेपरबैक्स’ ने भी इसे प्रकाशित किया.

राजेंद्र यादव का सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘सारा आकाश’ कई सालों बाद आज भी सच बयां करता है, हमारे आसपास घट रहा कोई सच! इसलिए यह उपन्यास ऐतिहासिक होने के साथ-साथ समकालीन की श्रेणी में भी रखा जा सकता है. उपन्यास कथा का केंद्र ‘समर’ और उसके आठ सदस्यों का संयुक्त परिवार है. समर एक ऐसा युवक है, जो एम.ए. करके प्रोफेसर बनना चाहता है, लेकिन बारहवीं में ही उसकी इच्छा के विपरीत उसका विवाह कर दिया जाता है और उसके सपने टूट जाते हैं… कहानी के एक पात्र के माध्यम से लेखक ने भारतीय संस्कृति, संयुक्त परिवार, पूजा, व्रत, पाखंड, पुराण आदि पर गहरा कटाक्ष किया है. उपन्यास की कथा यथार्थवादी अनुभूति के साथ विकसित होती है और भयानक यथार्थ के बीच उसका अंत होता है. उपन्यास सामाजिक यथार्थवाद को पूर्णरूपेण चित्रित करने में पूर्णत: समर्थ है.

राजेंद्र यादव लिखते हैं, “आज़ाद भारत की युवा पीढ़ी के वर्तमान की त्रासदी और भविष्य का नक्श़ा. आश्वासन तो यह है कि संपूर्ण दुनिया और सारा आकाश तुम्हारे सामने खुला है- सिर्फ़ तुम्हारे भीतर इसे जीतने और नापने का संकल्प हो- हाथ-पैरों में शक्ति हो… मगर असलियत यह है कि हर पांव में बेड़ियां है और दरवाज़ा बंद है. युवा बेचैनी को दिखाई नहीं देता कि किधर जाए और क्या करे. इसी में टूटता है उसका तन, मन और भविष्य का सपना. फिर वह क्या करे- पलायन, आत्महत्या या आत्मसमर्पण?”

प्रस्तुत है हिंदी कथा-साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर राजेंद्र यादव के लोकप्रिय उपन्यास ‘सारा आकाश’ का पुस्तक अंश-

पुस्तक अंश : सारा आकाश
जब सारा आसमान सलेटी रहता है, बस पूरब में इस छोर से उस छोर तक छाया बैंगनी प्रकाश धीरे-धीरे सुनहला पड़ता जाता हो, और फिर बीच दिशा के कुहरे के भारी-भारी परदे इधर-उधर सरकाकर एक ज्योतिर्मय मुख बाहर झांकने लगता हो, हवा में हलकी-हलकी शीतलता बढ़ जाती हो- पास वाले पेड़ के पत्ते हिलने लगते हों और धीरे-धीरे नगर जागने लगता हो तो अपनी छत की मुंडेर के सहारे, एक पांव मुंडेर पर टिकाए, उस क्षण को देखना और मन की अनेक सतहों पर महसूस करना कैसा आह्लादकारी अनुभव है, यह मैंने पहली बार जाना. पहली बार देखा कि सूरज किस तरह धीरे-धीरे उठता है. कभी लगता, गोला तेज़ी से लट्टू की तरह चक्कर खाता हुआ उठ रहा है और कभी लगता बहुत ही धीरे-धीरे लहरों पर झूमती गेंद की तरह. एक-एक चीज़ को देखता और मन में कोई कहता, ‘अरे, मैं तो जानता नहीं था कि सूरज निकलने से पहले किरणें इस तरह उठती हैं जैसे फव्वारे की धारियां उठती हों और सामनेवाले ऊंचे तिमंजिले मकान के एरियल का बांस सबसे पहले किरणों का स्पर्श पाता है.’ हर क्षण लगता, जैसे मुझे नया ज्ञान हो रहा है और इच्छा होती कि कोई पास में खड़ा होता और ये इतनी सारी नई बातें उसे बताता चलता, उसे धीरे-धीरे सूर्योदय दिखाता.

लेकिन लगा जैसे ज़िंदगी में खुद मैं ही पहली बार सूर्योदय देख रहा हूं. उन दिनों तो जाने किन अंधेरी कोठरियों में कैद था. देखता ही नहीं था कि मेरे आस-पास हो क्या रहा है. अब रोशनी में आया हूं तो लगता है कि इतने दिनों अंधेरे में बंद रहने की झेंप आंखें नहीं मिलाने दे रही. सचमुच… रोशनी में प्रभा से कैसे बातें कर पाऊंगा, सीधा उसके चेहरे की ओर कैसे देख पाऊंगा ! उन आरोप करती उलाहने-भरी आंखों का सामना कैसे कर पाऊंगा? सबसे बातें करते हुए मुझे कितना संकोच होगा? शायद अब तो घरवाले, बाबूजी इत्यादि खुश हो जाएंगे. अब भाभी इशारे से डॉक्टर को दिखाने को नहीं कहेंगी… हां, जिस बात के इशारे से मेरे तन-बदन में आग लग जाती थी, उसे याद करके अब खुद-ब-खुद मुस्करा उठा.

थोड़ी देर पहले प्रभा उठकर गई थी, न मैंने उसकी ओर देखा था और न वह सीधे मेरी ओर देख पाई थी. और फिर मैं चुपचाप उठकर यहां चला आया. देर तक खड़ा-खड़ा देखता रहा. समझ में नहीं आया कि अब क्या काम करूं? लोग मुझे देखें, इससे पहले ही मैं चुपके से उठकर निकल जाना चाहता था. तभी ध्यान आया कि प्रभा ने पोस्टकार्ड मांगा था.

सड़कों पर जमादार कूड़ा खुरचते झाड़ू दे रहे थे. दूध की टंकियां साइकिल से बांधे दूधवाले किसी खुले दरवाज़े के सामने खड़े थे और बच्चे को गोद में लिए, चादर लपेटे कोई बूढ़े साहब दूध बरतन आगे बढ़ाए दूध ले रहे थे. एक जगह तो मैं सचमुच मुड़कर देखने लगा कि दूधवाला जब लुटिया भरकर टंकी से दूध निकालता है तो किस तरह उसकी लुटिया या उंगलियों से दूध बूंद-बूंद टपकता है. वह दृश्य मुझे बड़ा रोचक लगा और जब इसका खयाल आया तो खुद ही मैंने पूछा- ऐसा तो कभी नहीं हुआ था. लगता था जैसे रास्ते में मिलनेवाला हर आदमी जानता है कि मैं सुख के कितने शक्तिशाली फव्वारे को बलपूर्वक अपने भीतर ही दबाए चल रहा हूं. हर क्षण डर लगता कि कहीं यह बांध टूट न जाए और मैं पागलों की तरह सड़कों पर चिल्लाता हुआ भागना शुरू कर दूं- ‘देखो, मैं सुखी हूं. मैं बहुत सुखी हूं.’ समझ में नहीं आया था कि अपने इस आनंद को व्यक्त कैसे करूं ! प्रभा की इस समय क्या हालत होगी, इस बात की कल्पना से ही मेरा सारा अंग रोमांचित हो जाता था. एक शराब थी जो सूखी बालू पर पड़ी बूंदों की तरह सीझ-सीझकर अणु-अणु में समाई जा रही थी, और सारी धरती न हो आई थी… कितनी भीषण गर्मी, झुलसानेवाली लू-धूप के बाद स्वच्छंद निर्झर की शीतल-शांति को युगों-प्यासे की तरह पी रहा था.

खूब ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें देने के बाद दिवाकर साहब ने जम्हाइयां लेते हुए दरवाजे से मुंह निकाला, “क्या है? रात को ग्यारह बजे गया और फिर सुबह सात बजे ही आ धमका?” फिर भीतर यह देखकर कि कोई आ तो नहीं रहा, दुष्टता से बोला, “तेरी बीवी तो मैके में है, अब बीवीवालों के आराम से क्यों जलता है?”

बीवी को लेकर किया गया यह मज़ाक सचमुच भीतर से मन को गुदगुदा गया. कहना चाहा, ‘कि कम्बख्त की बीवी मैके में है?’… लेकिन ऊपर से चेहरा गंभीर बनाए रखकर पूछा, “तुम्हारा मतलब क्या है? चला जाऊं? निकलकर तो देख, कितना दिन चढ़ आया है !”

“जो जिसका काम है सो करेगा ही. हम तो अभी आपकी बांगों से सोकर उठे हैं, मुंह-हाथ धोएंगे. अरे इम्तिहान में इतना पिले हैं, अब ज़रा-सा आराम भी न करें? लॉर्ड आदमी हैं. तेरी तरह भगवान् से य थोड़े ही कह आए थे कि दिन निकलने से चार घँटे पहले उठूंगा, उठते ही ठंडे पानी में डूबूंगा, फिर सारे संसार को जगाने निकल पड़ूंगा.” उसने बैठक के किवाड़ों को पूरा खोलकर कहा, “ले आइए तशरीफ़.”

“अच्छा तो चलें. अभी तो आप सजने-संवरने में ही दो-ढाई घंटे लेंगे.” मैं बैठक के भीतर आकर आराम से बैठ गया.

“आज तो चेहरा बड़ा चमक रहा है. क्या बात है? फर्स्ट डिवीज़न में पास होने का सपना दीख गया क्या? सुबह-सुबह देखे सपने अक्सर सच होते हैं.” उसने आलस्य से फिर जम्हाई ली.

“यार, इस इम्तिहान की ही याद मत दिलाया कर. मेरी जाम निकल जाती है. पता नहीं, पास भी होंगे या नहीं. फेल ही हो गए तो सचमुच, हमें मरने की भी जगह नहीं है.” सच बात थी, जब-जब इम्तिहान या परीक्षा-फल का ध्यान आता तो दिमाग से हर बात उड़ जाती, दिल धसक उठता. न जाने क्या होगा? लेकिन एक झटके से इन सारे विचारों को दूर करके मैंने कहा, “छोड़ो भाई, इस बारे में बात मत कर, जो होगा सो देखा जाएगा. अभी से प्राण सुखाने की क्या ज़रूरत !” फिर आश्चर्य हुआ, यह भविष्य के प्रति लापरवाही मेरे मन में पहले तो नहीं थी.

थोड़ी देर चुप रहकर वह बोला, “अभी तक कल की बात पर माताजी का मुंह फूला हुआ है. बताओ, एक दिन अगर अपनी पत्नी के साथ सिनेमा चले गए तो क्या मुसीबत हो गई? इन लोगों की बात हमारी समझ में नहीं आती. विश्वास करो, मैंने तो एक भी घर नहीं देखा, जहां सास अपनी बहू से खुश हो. चार लड़के हों तब भी वही बात और दो हों तब भी वही. मैं चाहता हूं कि आज यह झगड़ा ठंडा हो जाए…”

“अच्छा, अभी तक चल रहा है?” लेकिन लगा जैसे यह वाक्य मैंने उससे नहीं, अपने आपसे कहा. दीवार से सटकर दबी-सिमती प्रभा और दूसरी ओर अम्मा और भाभी की तसवीर आंखों के सामने आ गई. अचानक आंखे भी आईं. मुझे अपने रग-रग से रोती हुई मुन्नी की आवाज़ सुनाई देती रही, ‘भैया, भाभी से बोलो.’ पहले इस आवाज़ को मैंने सुना और दूसरे काम से निकाल दिया, लेकिन इस क्षण अपने भीतर से उठती हुई इस आवाज़ की प्रतिध्वनि से मेरे आस्तित्व का अणु-अणु गूंज उठा. मन हुआ मुन्नी से लिपट जाऊं और उसके कान में अपनी आंनद-विह्वल वाणी में कुक उठूं ‘देख मुन्नी, मैं बोला, मैं तेरी भाभी से बोला.’ लेकिन मुन्नी अब है कहां? उसे तो गड्ढे में धकेलकर उसके मुंह पर पत्थर लगा दिया है. मुझे लगा जैसे मुन्नी मेरे भीतर अपनी मुक्ति के लिए तड़फड़ा रही है. उसने मुझे एक गड्ढे से निकाल लिया था और खुद उसमें जा गिरी थी. काश, ज़रा पहले वह मुझे निकाल लेती हो मैं उसे उस नरक में कभी न जाने देता.

दिवाकर की किसी बात से मैं चौंककर सिटपिटा उठा. कहीं इसने समझ तो नहीं लिया कि मैं क्या सोच रहा हूं? यह मेरी बहुत बुरी आदत है, यों बातें करते-करते सोचने लगता हूं. दिवाकर कह रहा था, “समर, कल हमारे एक चचेरे भाई आनेवाले हैं. मैं चाहता हूं कि माताजी की नाराज़गी आज ही ठीक हो जाए तो अच्छा है. पिछली बार आए थे तब तो मैं तुम्हें मिला नहीं पाया. बाबा रे, कितना घूमा है उन्होंने भी ! कोई शहर नहीं छोड़ा. लेकिन भाई, अपनी यह चोटी-वोटी कटा आना. अगर कहीं वे इसका मज़ाक बनाने लगें और तू बुरा मान बैठे !” ऐसे ही हैं वे ज़रा. उन्हें यह ढोंग-वोंग कम ही पसंद हैं.”

“यह ढोंग क्या? अपना-अपना विश्वास है.” मैं बहस बढ़ाना नहीं चाहता था.

“अच्छा विश्वास है कि आप अलग जा रहे हैं और हिंदुत्व का झंडा अलग फहराता जा रहा है. इसकी उपयोगिता ज़रूर है. किसी से लड़ाई हो जाए तो लपककर सबसे पहले चोटी पकड़ो, दूसरा आदमी हिलेगा-डुलेगा, लेकिन कर कुछ नहीं सकता. हां इम्तिहान के दिनों में इसे खूंटी से बांधकर पढ़ा भी जा सकता है.” और वह खुद ही हंस पड़ा.

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