नई दिल्ली: डेंगू का बुखार ‘संक्रामक’ होता है, या ‘जीवन में यह एक बार ही होता है.’ या फिर ‘डेंगू का मच्छर केवल दिन में काटता है.’ इस वायरल संक्रमण को लेकर यह वह गलतफहमियां हैं जिसे लेकर भारतीय आमतौर पर उलझन में रहते हैं. फिर आती है इसके इलाज को लेकर बातें, जैसे पपीते की पत्ती या बकरी का दूध पीने से, गिलोय का रस पीने से प्लेटलेट्स का स्तर बढ़ जाता है. डेंगू से पीड़ित होने के दौरान इससे शरीर को लड़ने की ताकत मिलती है.

जैसे ही डेंगू का मौसम फिर से मुंह उठा रहा है, डॉक्टर भारतीय समाज में मौजूद इन गलतफहमियों को लेकर चिंतित हैं. जिसे लोग बीमारी को रोकने या ठीक करने के लिए मानते हैं या अपनाते हैं और स्थिति गंभीर बना लेते हैं. डेंगू बुखार से जुड़ी तमाम तरह की गलतफहमियों को दोषी मानते हुए चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि परिवार रोगी के लिए उचित चिकित्सा उपचार अपनाने के बजाए हर्बल या घरेलू उपचार में लगा रहकर उस कीमती वक्त को बरबाद करता है जो मरीज के लिए बेहद अहम होता है.

बीएलके मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के आंतरिक चिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. राजिंदर कुमार सिंघल ने News18 को बताया, “हाल ही में हुई बारिश के बाद दिल्ली-एनसीआर सहित भारत के कई हिस्सों में डेंगू से संबंधित मामलों में बढ़ोतरी देखी गई.”

डेंगू से जुड़ी पांच अहम गलतफहमियां, डॉक्टर जिससे बचने की सलाह देते हैं.

गलतफहमी 1- बकरी का दूध, पपीते की पत्ती और गिलोय जूस से प्लेटलेट्स की संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है

डेंगू का सबसे अहम लक्षण प्लेटलेट्स का स्तर कम होना होता है. इसे बढ़ाने को लेकर ढेर सारी गलतफहमियां चारों तरफ पसरी हुई हैं. जिसमें जड़ी बूटियों से लेकर घरेलू उपचार तक तमाम तरह की बातें शामिल हैं. अमृता अस्पताल, फरीदाबाद के संक्रामक रोग विभाग में सलाहकार डॉ. रोहित गर्ग के मुताबिक, डेंगू बुखार में “पपीते के पत्ते के रस या बकरी के दूध आदि की कोई भूमिका नहीं होती.” क्लीनिकल अध्ययन में भी इसके फायदे को लेकर कोई सटीक साक्ष्य नहीं दिया है. 2019 के एक बड़े मेटा-विश्लेषण ने निष्कर्ष निकाला, “डेंगू में पपीते के अर्क की भूमिका पर टिप्पणी करने के लिए वर्तमान साक्ष्य अपर्याप्त हैं.”

फोर्टिस अस्पताल, वंसत कुंज में इंटरनल मेडिसिन में वरिष्ठ सलाहकार, डॉ मुग्धा तापड़िया का कहना है,  ‘यह देखा गया है कि डेंगू बुखार के दौरान लोग पपीते की पत्ती का रस, गिलोय का जूस पीना शुरू कर देते हैं, हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, और इसके इस्तेमाल को लेकर कोई परीक्षण भी नहीं हुआ है, ऐसे में इससे बचना चाहिए.’

डॉ. तापड़िया आगे कहती हैं कि, बल्कि पपीते की पत्ती या गिलोय की वजह से गेस्ट्राइटिस या उल्टी की शिकायत होने लगती है. डेंगू के दौरान, उल्टी होना घातक है, क्योंकि इससे शरीर में पानी की कमी हो जाती है. जबकि प्लेटलेट का घटना या बढ़ना ऐसी प्रक्रिया है जो शरीर खुद ठीक करता है. इसलिए जब तक परीक्षण के नतीजे नहीं मिलते हमें इस तरह के वैकल्पिक तरीकों को अपनाने से बचना चाहिए.

फिर लोग क्यों ऐसा दावा करते हैं कि पपीते का रस पीने से उनके प्लेटलेट के स्तर में सुधार हुआ है?

स्यूडोसाइंस (छद्म विज्ञान) से जुड़ी गलतफहमियों के दूर करने के लिए चर्चित हिपेटोलॉजी के विशेषज्ञ डॉ. एबी सिरिएक फिलिप अपने ट्वीट में इसे विस्तारपूर्वक समझाते हुए लिखते हैं कि, बीमारी की प्रकृति से जुड़े इतिहास में जब प्लेटलेट खुद से बढ़ जाती है, तो वे इसे पपीते के रस के इस्तेमाल की वजह से होना बताते हैं. इसे “post hoc fallacy” कहा जाता है यानी यह धारणा बनाना कि क्योंकि एक घटना दूसरी घटना से पहले हुई है तो वह जरूर आपस में जुड़ी होंगी.

चूंकि डेंगू खुद से ठीक होने वाली वायरल बीमारी है, इसलिए प्लेटलेट काउंट बीमारी के दौरान क्षणिक रूप से कम हो जाते हैं, हालांकि इसमें सुधार भी बहुत तेजी से होता है. लेकिन कुछ गंभीर मामलों में प्लेटलेट का स्तर बहुत कम हो जाता है या रक्तस्राव होने लगता है, ऐसे में खून (प्लेटलेट) चढ़ाने की जरूरत पड़ जाती है.

डॉ. सिंघल कहते हें कि, प्लेटलेट चढ़ाना कोई जरूरी नहीं है, जब किसी में रक्तस्राव के लक्षण दिखते हैं या प्लेटलेट का स्तर 10,000 से नीचे चला जाता है तब इसकी जरूरत पड़ती है.

गलतफहमी 2 –  डेंगू संक्रामक होता है

बिल्कुल नहीं. डेंगू वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सिर्फ मच्छर के काटने से पहुंचता है. अमृता अस्पताल के डॉ. गर्ग कहते हैं कि, इसके फैलने का कोई दूसरा ज्ञात तरीका नहीं है, इसलिए यह संपर्क में आने से नहीं फैलता है.

गलतफहमी 3- डेंगू का बुखार हानिरहित स्थिति है.

डेंगू एक वायरल बीमारी है जिसमें कोई लक्षण नहीं होना, हल्का बुखार होने से लेकर गंभीर बीमारी हो सकती है. हालांकि ज्यादातर लोगों में इस बीमारी से हल्का बुखार ही होता है लेकिन कुछ मरीजों में यह गंभीर रूप ले लेता है. खासकर उन लोगों में जिन्हें किडनी, लिवर से जुड़ी बीमारी हो या जिनकी इम्यूनिटी कमजोर हो.

गलतफहमी 4- डेंगू का मच्छर केवल दिन में काटता है

गलत. दरअसल एडियस एजिप्टी (AA) मच्छर दिन में भोजन करने वाले होते हैं. यानी यह खाने के लिए दिन में बाहर निकलते हैं. इसी वजह से AA के काटने के ज्यादातर मामले दिन में होते हैं. लेकिन डॉ. सिंघल कहते हैं कि, शाम या रात में लोगों को काटने और डेंगू से संक्रमित होने के मामले भी सामने आए हैं.

गलतफहमी 5 –  जीवन में डेंगू का संक्रमण एक बार होता है

विशेषज्ञ इस गलतफहमी को अधूरा सच कहते हैं. डेंगू वायरस के चार स्ट्रेन होते हैं. किसी एक वक्त में संक्रमण एक स्ट्रेन की वजह से होता है. जिसके बाद उस स्ट्रेन के प्रति व्यक्ति में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है. डॉ. सिंघल कहते हैं, हालांकि तीन और स्ट्रेन हैं जो व्यक्ति को बाद में बीमार कर सकती हैं. इसका मतलब यह हुआ कि किसी भी व्यक्ति में जीवन में चार बार डेंगू हो सकता है (ऐसा मानकर कि वायरस की कोई नई स्ट्रेन नहीं पनपेगी). यानी आपको अपने जीवनकाल में एक डेंगू स्ट्रेन से एक बार ही डेंगू हो सकता है.

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