No Ice in Arctic 2030: जलवायु परिवर्तन का पर्यावरण पर भीषण प्रभाव पड़ रहा है. वैज्ञानिकों ने अब डरावना खुलासा किया है. जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित के स्टडी के अनुसार, 2030 तक आर्कटिक की बर्फ पिघल जाएगी. यह सितंबर के महीने के दौरान पूरी तरह से गायब होने की
आशंका है. वैज्ञानिकों ने बताया, ‘समुद्री बर्फ पर निर्भर रहने वाले जानवर इसका प्रभाव महसूस करेंगे. ध्रुवीय भालू, वालरस और बारहसिंगा सहित कई प्रजातियों को जीवित रहने में परेशानी होगी.’

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कई ठोस प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं के बावजूद, जलवायु परिवर्तन का पारिस्थितिकी तंत्र पर भयानक प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है. आर्कटिक की बर्फ पिघलनी शुरू हो गई है.

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जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस ने मंगलवार को एक नया अध्ययन प्रकाशित किया जिसमें कहा गया है कि 2030 के दशक में सितंबर के महीने के दौरान आर्कटिक से समुद्री बर्फ पूरी तरह से गायब होने की आशंका है.

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आर्कटिक की बर्फ पिघलेगी तो समुद्र के पानी का स्तर तेजी से बढ़ेगा. जिससे पूरी दुनिया को बाढ़ का खौफ सताएगा. वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन के कारण ग्लोबल वार्मिंग ही इसकी बड़ी वजह है.

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वैज्ञानिक आर्कटिक महासागर को “बर्फ मुक्त” के रूप में वर्णित कर रहे हैं. बर्फ से ढका यह क्षेत्र एक मिलियन वर्ग किलोमीटर से कम है, या महासागर के कुल क्षेत्रफल का लगभग सात प्रतिशत है.

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वैज्ञानिकों ने बताया, ‘समुद्री बर्फ पर निर्भर रहने वाले जानवर इसका प्रभाव महसूस करेंगे. ध्रुवीय भालू, वालरस और बारहसिंगा सहित कई प्रजातियों को जीवित रहने में परेशानी होगी.’ हैम्बर्ग विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर नॉटज ने कहा कि अब बर्फ को संरक्षित करने में काफी देर हो चुकी है.

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