सिनेमा में होस्टेज सिचुएशन यानी बंधक बनाने की परिस्थितयों का बहुतायत से इस्तेमाल होता आया है. फिल्म शोले (Sholay) के क्लाइमेक्स में तो धर्मेंद्र (Dharmendra) को अमजद खान के अड्डे पर बांध के रखा जाता है और हेमा मालिनी (Hema Malini) से नाच कराया जाता है. कुछ दिन पहले राम माधवानी (Ram Madhvani) निर्देशित धमाका (Dhamaka) भी एक होस्टेज सिचुएशन पर थी. हर होस्टेज फिल्म का एक ही मकसद होता है, हीरो के सबसे पसंदीदा शख्स जैसे उसकी गर्लफ्रेंड, बीवी या बच्ची को अगवा कर के बंधक बनाना और उसे रिहा करने के बदले हीरो से उसकी गलती मनवाना. कोरियन फिल्म ओल्ड बॉय की हिंदी नकल “ज़िंदा” में जॉन अब्राहम (John Abraham) अपनी बहन की हाई स्कूल में की गयी बेइज्जती का बदला लेने के लिए संजय दत्त (Sanjay Dutt) को कई साल तक एक कमरे में कैद करके रखते हैं. लॉकडाउन में फिल्मों की शूटिंग पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा था वहीं कुछ फिल्म मेकर्स ने इस सीमित क्षमता का इस्तेमाल कर के कंप्यूटर स्क्रीन को कैमरा बना कर फिल्म शूट की. 2020 में रिलीज़ मलयालम फिल्म ‘सी यू सून’ इस तरह की पहली फिल्म है जिसमें अधिकांश दृश्य कंप्यूटर में लगे कैमरे की आंख से दिखाए गए हैं. इसी तर्ज़ पर अब एक तेलुगु फिल्म डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू (हू, व्हाय, वेयर) (WWW) अमेज़ॉन प्राइम (Amazon Prime) पर रिलीज हुई है, जिसमें पूरी फिल्म कंप्यूटर स्क्रीन के कैमरे के माध्यम से शूट की गयी है.

WWW की कहानी
डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू की कहानी लिखी है फिल्म के निर्देशक केवी गुहन ने. अंग्रेजी फिल्मों से प्रभावित हो कर फिल्म बनाने की हमारी आदत से हम बाज़ नहीं आने वाले हैं और एक बार फिर हमने ऐसी परिस्थितयों को केंद्र में रख कर फिल्म रची है जो कि होने की संभावनाएं नहीं के बराबर हैं. फिल्म का हीरो विश्वा (अदित अरुण) एक कंप्यूटर हैकर है जिसे अपनी एक हैकर मित्र क्रिस्टी (दिव्या श्रीप्रदा) की रूममेट मित्रा (शिवानी राजशेखर) से प्यार हो जाता है. विश्वा उस लड़की को अपना पेशा रिक्रूटमेंट कंपनी का सीईओ बताता है और मित्रा के भाई को नौकरी भी दिलवा देता है. जैसे ही दोनों मिलने का प्लान करते हैं मोदीजी लॉकडाउन की घोषणा कर देते हैं. इससे बचने के लिए मित्रा के रूम में एक बढ़िया कंप्यूटर लगा दिया जाता है और दोनों पूरा दिन ऑनलाइन वीडियो चैट करते रहते हैं.

एकदिन अचानक एक अनजान शख्स मित्रा के रूम में घुस जाता है, क्रिस्टी को चाकू मार देता है और शुरू होता है विश्वा को ब्लैकमेल करने का सिलसिला. विश्वा को अपने और हैकर मित्रों का नाम उजागर करने पर मजबूर किया जाता है, उसे अपनी माँ को उसके हैकर होने की हकीकत बताने को कहा जाता है. विश्वा ने मित्रा के पिता की कंपनी की वेबसाइट हैक की थी जिस वजह से मित्रा के पिता ने आत्महत्या कर ली थी और उनके परिवार पर मुसीबत आ जाती है, ये सच भी सामने आता है. धीरे धीरे पता चलता है कि ये हमलावर एक गेम डिज़ाइनर है जिसका डाटा विश्वा ने हैक कर बेच दिया था और ये डिज़ाइनर बर्बाद हो गया था और उसकी पत्नी ने आत्मा हत्या कर ली थी, जिसका बदला लेने के लिए वो ये सब कर रहा है. इन तमाम बातों के बीच विश्वा और उसके दोस्तों को ढूंढती पुलिस की साइबर सेल के इंस्पेक्टर खान को विश्वा इस मुसीबत से अवगत करवाता है. खान आकर मित्रा को बचाते हैं, क्रिस्टी को हॉस्पिटल ले जाते हैं और उस शख्स को गिरफ्तार कर लिया जाता है.

कैसी है WWW?
प्रथम दृष्टया कहानी से काफी आशाएं जागती हैं, लेकिन जिस तरीके से ये फिल्म आगे बढ़ती है, वो बहुत ही बोरिंग है और ऊपर से अभिनेता सभी अत्यंत साधारण हैं. विश्वा को मित्रा की आवाज़ अच्छी लगती है, उसकी पेंटिंग देख कर प्यार होता है और फिर कंप्यूटर स्क्रीन के माध्यम से देख कर उसका दीवाना हो जाता है. प्यार परवान चढ़ रहा होता है लेकिन कभी भी मित्रा ये सवाल नहीं करती की विश्वा की रिक्रूटमेंट कंपनी का नाम क्या है, खास कर तब जब उसके भाई को विश्वा के माध्यम से नौकरी मिलती है. विश्वा एक हैकर है लेकिन वो मित्रा का इंस्टाग्राम अकाउंट ही देख पाता है उसकी कोई भी तस्वीर उसे इंटरनेट पर नहीं मिलती. विश्वा के 2 और हैकर दोस्त हैं, वो फिल्म में नहीं होते तो कोई फर्क नहीं पड़ता.

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विश्वा का एक मुफ्तखोर बीयरबाज दोस्त भी फिल्म में क्यों है, पता नहीं. जो हमलावर है वो किसी भी तरीके से पढ़ा लिखा जान नहीं पड़ता तो कंप्यूटर गेम डिज़ाइनर कैसे लग सकता है? हमलावर सीधे घर में घुस आता है और चाकू चलाने लगता है, क्या आस-पड़ोस में आवाज़ नहीं जाती? विश्वा ने ही मित्रा के पिता की कंपनी की वेबसाइट हैक की थी और उसका इलज़ाम मित्रा के पिता पर लगाया गया था जिस वजह से उन्होंने आत्महत्या कर ली. क्या किसी कंपनी को जांच में इतना भी पता नहीं होता कि हैकिंग हुई है? अपने पिता के अप्रत्यक्ष हत्यारे से मिलना और उस से स्क्रीन के ज़रिये ही प्रेम कर बैठना, इसकी कितनी सम्भावना होती है जबकि विश्वा ऐसा कुछ तो नहीं करता जिसकी वजह से मित्रा को उस से प्रेम हो जाये. ऐसी ही कई विसंगतियां कहानी में शामिल हैं जिस वजह से देखने का मज़ा किरकिरा हो जाता है.

कंप्यूटर स्क्रीन के ज़रिये पूरी फिल्म शूट की गयी है और इस तरह के प्रयोग के लिए या तो कहानी मज़बूत चाहिए या अभिनेता. डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यूकी बदकिस्मती है कि न इसकी पटकथा में दम है और ना ही इसके अभिनेता अच्छे हैं. अदित अरुण को अभिनय सीखने की सख्त जरूरत है. अधिकांश समय वो एक ही एक्सप्रेशन में नज़र आते हैं. उनकी बेचैनी और बेचारगी में कोई अंतर नहीं नज़र आता. शिवानी राजशेखर की यह दूसरी फिल्म है और एक फ़िल्मी फॅमिली की होने के बावजूद उनके अभिनय की सीमा बहुत छोटी लगी है. बाकी कलाकार साधारण हैं, कुछ व्यर्थ में रखे गए हैं. साइबर सेल अफसर खान सिवाय ओवरएक्टिंग के कुछ नहीं करते.

निर्देशक केवी गुहन मूलतः सिनेमेटोग्राफर हैं और बतौर निर्देशक ये उनका तीसरा प्रयास है, लेकिन न तो उनकी कहानी में न उनके कथा कथन में और न ही सिनेमेटोग्राफी में कुछ खासियत नजर आती है. उन्हें फहाद फ़सील की फिल्म सी यू सून के सिनेमेटोग्राफर साबिन और निर्देशक महेश से सीखना चाहिए कि एक कंप्यूटर स्क्रीन से कैसे कैसे अलग अलग एंगल्स का इस्तेमाल करते हुए दृश्य को अलग और रोचक बनाया जा सकता है. साइमन किंग का म्यूजिक है और फिल्म में 3 गाने और 1 थीम है. नैलू नदी धार अच्छा गाना है लेकिन कर्नाटकी संगीत का अंश थोड़ा अजीब लगता है. हू, व्हाय, वेयर नाम का एक रैप भी है जिसे लॉकडाउन सॉन्ग कह कर प्रमोशन के लिए इस्तेमाल किया गया है. एडिटर तम्मी राजू के पास कुछ करने को तब होता जब स्क्रिप्ट अच्छी होती. शॉट डिवीज़न में एक शॉट इस स्क्रीन का और एक शॉट उस स्क्रीन का जमा कर फिल्म की एडिट की गयी है. कच्ची पटकथा को अच्छा एडिटर भी नहीं बचा सकता.

हू, व्हाय, वेयर यानि डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू को देखने के बजाये दो घंटे तक बंद कंप्यूटर स्क्रीन को निहारना एक बेहतर काम होगा. इस तरह के एक्सपेरिमेंट के लिए किसी अनुभवी स्क्रिप्ट राइटर का साथ होना ज़रूरी है सिर्फ सिनेमेटोग्राफर की नज़र से फिल्म अच्छी नहीं बनती.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

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